महावीर के महावाक्य
महावीर के महावाक्य तीन मूल उपदेशों में समाए हैं: मनुष्य को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, दूसरों को दुख देने वाली हिंसा त्यागनी चाहिए, और संयम से इच्छाओं पर अंकुश रखना चाहिए।
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महावीर के महावाक्य तीन मूल उपदेशों में समाए हैं: मनुष्य को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, दूसरों को दुख देने वाली हिंसा त्यागनी चाहिए, और संयम से इच्छाओं पर अंकुश रखना चाहिए।
मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अहिंसा का महत्त्व है। योगशास्त्र, समन्तभद्र, कुन्दकुन्द और अमृतचन्द्र के प्रमाणों से लेख बताता है कि मद्य, मांस, मधु और हिंसक व्यापार का त्याग तथा प्रमाद-रहित, सावधान आचरण ही अहिंसा की व्यावहारिकता है।
भगवान महावीर ने पण्डितों की क्लिष्ट भाषा को अस्वीकार कर आम आदमी की लोकभाषा को धर्मोपदेश का माध्यम बनाया — यह युगप्रवर्तक भाषा-क्रान्ति थी। लेखक भाषा की शक्ति और सीमाओं, दिव्यध्वनि तथा इन्द्रभूति गौतम के प्रसंग से इसे समझाते हैं।
निःशस्त्रीकरण आज की अन्तर्राष्ट्रीय परिचर्चा का प्रमुख विषय है। साध्वी मंजुला के अनुसार यह भगवान् महावीर की शस्त्रपरिज्ञा का आधुनिक रूप है, क्योंकि वास्तविक शस्त्र हिंसा के मनोभाव हैं।
खजुराहो के जैन मन्दिर-समूह में स्थित आदिनाथ जिनालय पार्श्वनाथ मन्दिर से छोटा और लगभग सौ वर्ष बाद का है; सादी शिखर-संयोजना, सोलह शासन देवियाँ, गोवदन यक्ष और संवत् १२१५ का शिलालेख इसकी विशेषताएँ हैं।
‘जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन’ — इस पुरानी कहावतको लेखक सच्ची घटनाओंसे पुष्ट करते हैं और बताते हैं कि आहार, वस्त्र तथा स्थान और वातावरणकी शुद्धि साधकके लिए क्यों आवश्यक है।
डा० विद्याधर जोहरापुरकर के लेख की चर्चा करते हुए कुलपाक के माणिक स्वामी पर अतिरिक्त जानकारी: कन्नड कवि नागव की 'माणिकचरिते' की कथा, उसकी ऐतिहासिकता और कुलपाक के दिगम्बर क्षेत्र होने के प्रमाण।
मुनि कान्तिसागर एक पुरातत्त्वविद्द्वारा दिखाये गये चित्रोंके आधारपर पाँच प्राचीन दिगम्बर जैन मूर्तियोंका परिचय देते हैं और खेद प्रकट करते हैं कि जैन समाजका कोई सार्वजनिक पुरातत्त्व-संग्रहालय नहीं है।
सतना के पास सिन्दूरिया पहाड़ी पर खड़ा ‘पतियान दाई’ नामक छोटा पर सुरक्षित गर्भालय, जिसे पुरातत्त्व की चर्चा में शक्ति मंदिर कहा गया है — लेखक उसे उत्तर गुप्तकाल का पद्मावती मंदिर मानते हैं।
आद्य तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने पुरिमताल के सिद्धार्थ वन में वटवृक्ष के नीचे दीक्षा ली; जिनसेन और रविषेण के अनुसार इसी से यह स्थान प्रयाग कहलाया। लेख प्रयाग जैन तीर्थ के इतिहास, अक्षयवट और किले से मिली प्रतिमाओं पर प्रकाश डालता है।
राजस्थान के जैन ग्रंथ संग्रहालयों में लगभग डेढ़ लाख पाण्डुलिपियाँ सुरक्षित हैं, जिनकी प्रशस्तियों में शासकों, नगरों, व्यापार और सामाजिक जीवन की प्रचुर ऐतिहासिक सामग्री है। राजस्थान इतिहास कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन, जोधपुर में दिया गया भाषण।
मेघदूत से चली सन्देश काव्य परम्परा को जैन कवियों ने अपनाकर प्रेम-सन्देश के स्थान पर आध्यात्मिक सन्देश और मोक्ष की प्रेरणा दी। 'संस्कृत के जैन सन्देश काव्य' शोध-प्रबन्ध के आठ अध्यायों का परिचय।