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खजुराहो का आदिनाथ जिनालय

खजुराहो के जैन मन्दिर-समूह में स्थित आदिनाथ जिनालय पार्श्वनाथ मन्दिर से छोटा और लगभग सौ वर्ष बाद का है; सादी शिखर-संयोजना, सोलह शासन देवियाँ, गोवदन यक्ष और संवत् १२१५ का शिलालेख इसकी विशेषताएँ हैं।

‘खजुराहो का आदिनाथ जिनालय’ — अनेकान्त (1965) से नीरज जैन का लेख
Samyakgyan Prachar-Prasar Trust
In this article
  1. आदिनाथ जिनालय: आकार और शैली
  2. भित्तियों पर शासन देवियाँ और गोवदन यक्ष
  3. अप्सराएँ और नर्तकी नीलाञ्जना
  4. शिखर की सादगी और कलश की भव्यता
  5. प्रवेश द्वार और गर्भगृह
  6. स्रोत

खजुराहो अपने अद्वितीय कला भण्डार के कारण दिन प्रति दिन प्रसिद्धि के शिखर की ओर बढ़ रहा है। यहाँ के शिल्प-सौंदर्य का कीर्तिगान सात समुन्दर पार भी अपनी पूरी लय और तान के साथ गूँज रहा है। यह स्थान मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित है तथा महोबा, हरपालपुर, छतरपुर और पन्ना तथा सतना से यहाँ के लिए बस द्वारा जाया जा सकता है।

खजुराहो में अन्य धर्मों के साथ साथ जैनधर्म का भी बड़ा प्रचार रहा है और आज भी जो प्रचुर जैन पुरातत्त्व वहाँ पाया जाता है वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। जैन पुरातत्त्व, मन्दिरों के एक प्रथक समूह में ही स्थित है, जिसे हम—१. पारसनाथ मन्दिर, २. आदिनाथ मन्दिर, ३. शान्तिनाथ मन्दिर, ४. घंटाई मन्दिर तथा ५. जैन संग्रहालय के रूप में जानते हैं। इस समस्त कला भण्डार का परिचयात्मक वर्णन तो मैंने अपनी एक प्रथक् पुस्तक “खजुराहो का जैन पुरातत्त्व” में किया है परन्तु उनका संक्षिप्त वर्णन अनेकान्त के पाठकों की सेवा में क्रमशः प्रस्तुत किया जा रहा है। जैन ग्रुप का पार्श्वनाथ मन्दिर समूचे खजुराहो का संभवतः सर्वाधिक सुन्दर मन्दिर कला मर्मज्ञों द्वारा माना गया है। उसका वर्णन अनेकान्त की किरण ४ पृष्ठ १५१ (अक्टूबर १९६३) में प्रकाशित हो चुका है। इस लेख में आदिनाथ जिनालय का वर्णन प्रस्तुत है।

आदिनाथ जिनालय: आकार और शैली

पार्श्वनाथ मन्दिर के पार्श्व में स्थित यह मन्दिर आकार प्रकार में उससे कुछ छोटा तथा लगभग एक सौ वर्ष उपरान्त की रचना माना जाता है। यह पंचायतन भी नहीं है परन्तु नागर शैली के मन्दिरों में उत्तर मध्य काल की एक विशिष्ट, सीधी परन्तु अलंकृत शिखर संयोजना के कारण समकालीन मन्दिरों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। ऊँचे अधिष्ठान पर स्थित इस मन्दिर के सामने का मण्डप कालदोष से ध्वस्त हो चुका था जो बाद में ईंट और चूने का बनवा दिया गया है। इसके अतिरिक्त शेष मन्दिर यथा स्थिति सुरक्षित है।

भित्तियों पर शासन देवियाँ और गोवदन यक्ष

भित्तियों पर मूर्तियों का अंकन यहाँ केवल बाहर पाया जाता है। प्रदक्षिणा पथ इसमें भीतर नहीं है। मूर्तियाँ उसी प्रकार एक पर एक तीन पंक्तियों में अंकित हैं। ऊपर की छोटी पंक्ति में गंधर्व, किन्नर, और विद्याधर तथा शेष दो पंक्तियों में शासन देवता—यक्ष, मिथुन तथा अप्सरायें आदि दिखाये गये हैं। एक तो यह कि बीच की पंक्ति में देव कुलिकायें बना कर उनमें अनेक जैन शासन देवियों की बड़ी-बड़ी ललितासन मूर्तियाँ स्थापित हैं। ये कुल सोलह हैं तथा इनके वाहन, आयुध और परिकर का ऐसा सजीव और बारीक अंकन यहाँ किया गया है कि उसके द्वारा उन देवियों का सही और शास्त्रोक्त स्वरूप समझने में बड़ी सहायता मिलती है। देवगढ़ के अतिरिक्त शासन देवियों का ऐसा अंकन अन्यत्र मैंने नहीं देखा। ये सोलह विद्या देवियाँ भी हो सकती हैं पर पूरी शोध के बिना निश्चित कुछ कहना अभी ठीक न होगा।

इन पट्टिकाओं की दूसरी विशेषता यह है कि इनके कोणों पर भगवान युगादि देव के शासन सेवक गोवदन यक्ष का बड़ा सुन्दर और वैचित्र्य पूर्ण अंकन है। यह यक्ष अपनी दर्प पूर्ण मुद्रा में मन्दिर के चारों कोनों पर अंकित है और चतुर्भुज होकर भी सीधा, मनुष्याकृति खड़ा हुआ दिखाया गया है। इसके आयुध, अलंकार, यज्ञोपवीत आदि बड़े स्पष्ट और सुन्दर हैं।

अप्सराएँ और नर्तकी नीलाञ्जना

अप्सराओं की मूर्तियाँ यहाँ निश्चित ही पार्श्वनाथ मन्दिर से कम हैं और उनका आकार भी थोड़ा छोटा है पर अपने विविध अभिप्रायों और भाव-भंगिमाओं को उजागर करने में वे किसी भी प्रकार असमर्थ नहीं दिखलाई देतीं। यहाँ शिखर की उठान सादी होने के कारण दर्शक के लिए ये मूर्तियाँ एकांत आकर्षण का केन्द्र बनकर उसकी चेतना को मोह लेती हैं और दृष्टि को भटकने नहीं देतीं। जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, बीच-बीच में शासन देवियों या विद्या देवियों का अंकन होने के कारण इन रूप राशि अप्सराओं की मनोहरता और सार्थक्य अधिक मान्य हो उठा है।

इन अप्सराओं में आरसी देखकर सीमंत में सिन्दूर आलेखन करती हुई रूप गर्विता तथा आरसी देखकर ही नयन आँजती हुई सुनयना और चुम्बन के व्याज से बालक पर ममता उड़ेलती हुई जननी का चित्रण बहुत स्वाभाविक, बहुत सुन्दर और बहुत अविस्मरणीय है। शृंगार की दाहकता से पीड़ित दर्शक की दृष्टि मातृत्व की इस शीतल धारा में अनुपम आनन्द की अनुभूति करती है। इन्हीं पंक्तियों में नायिकाओं तथा कामिनी भामिनियों का जो अंकन है वह भी एक गौरव तथा शालीनता के साथ भारतीय नारी के “स्त्रीत्व” की रक्षा का प्रयास करता हुआ सा जान पड़ता है। पश्चिम की ओर मध्य पंक्ति में खण्डिता नायिका की अस्त-व्यस्त वेषभूषा परन्तु लज्जापूर्ण मुद्रा मेरे इस कथन की साक्षी है।

एक और सविशेष अप्सरा का अंकन मध्य पंक्ति में परिक्रमा प्रारम्भ करते ही तीसरी श्रेणी पर मिलता है। इस नृत्यांगना के शरीर की फुर्ती और अति गतिमान चरणों का अंकन इतना सजीव है और मुद्रा इतनी शांत सौम्य तथा मनोहर है कि उसे देखकर मुझे विश्व-विश्रुत नर्तकी नीलाञ्जना का स्मरण हो आता है।

महापुराण में नीलाञ्जना का प्रसंग

भगवत् जिनसेनाचार्य ने महापुराण के सत्रहवें पर्व में भगवान आदिनाथ के दीक्षा प्रसंग का जो वर्णन किया है उससे ज्ञात होता है कि एक बार इन्द्र ने भगवान की सभा में उनकी आराधना हेतु नृत्य गान का आयोजन किया। उसी समय उसके मन में विचार आया कि भगवान को विराग कैसे उत्पन्न होगा? उसी वैराग्य के निमित्त रूप में इन्द्र ने अनिन्द्य रूपवती नीलाञ्जना नाम की अप्सरा का नृत्य प्रारम्भ कराया। इन्द्र को ज्ञात था कि उस नर्तकी की आयु शीघ्र ही समाप्त होने वाली है।

इस सुर सुन्दरी के भाव-लय-पूर्ण नृत्य ने एक बार भगवान आदिनाथ के मन को भी इस प्रकार अनुरूप बना लिया, जैसे अत्यन्त शुद्ध स्फटिक मणि भी अन्य पदार्थों के संसर्ग से लालिमा ग्रहण कर लेता है—

तन्नृत्यं सुरनारीणां मनोऽस्यारञ्जयत् प्रभोः।

स्फटिको हि मणिः शुद्धोऽप्यादत्ते रागमन्यतः॥

(महा० पु० १७-५)

नृत्य के बीच में ही नीलाञ्जना की आयु समाप्त हो गई और उसका शरीर लोप हो गया। इन्द्र ने तत्क्षण उसी रूप रेखा की दूसरी नर्तकी इस प्रकार प्रस्तुत कर दी कि साधारण दर्शक इस परिवर्तन को लक्ष्य भी न कर सके, पर भगवान ने जीवन की भंगुरता को लक्ष्य किया और वही उनके वैराग्य का निमित्त कारण बना।

मैं जिस अप्सरा मूर्ति की चर्चा कर रहा हूँ, वह अपने परिकर के मध्य ऐसे असाधारण रूप से उभरी हुई अंकित की गई है जिसे देख कर मुझे विश्वास होता है कि भगवान आदिनाथ के वैराग्य प्रसंग की नायिका नीलाञ्जना का ही अवतरण कलाकार ने यहाँ किया है।

शिखर की सादगी और कलश की भव्यता

प्रदक्षिणा के इस अंकन के बाद इस मन्दिर की जो विशेषता हमारा ध्यान आकर्षित करती है वह है इसके ऊंचे शिखर की सादगी और उस पर रखे कलश की भव्यता। इस शिखर में पार्श्वनाथ मन्दिर के शिखर की तरह उरु शृंग अथवा कर्ण शिखर नहीं बनाए गए हैं, बल्कि अधिष्ठान और भित्तियों के ऊपर से एक दम प्रारम्भ होकर यहाँ शिखर ने भगवान की निर्वाण भूमि कैलाश की किसी अलंघ्य चोटी का रूप प्रदर्शित कर दिया है।

इस शिखर को देख कर सहज ही कोणार्क और भुवनेश्वर शैली के मन्दिरों की याद आ जाती है। सज्जा में उपयुक्त एक रस शैली भी आँखों को ऊब नहीं देती बल्कि अपनी सहजता की ओर अधिक आकर्षित करती है।

ऊपर की सूची-चक्र-आमलक और कुम्भ-कलश बहुत मनोहर बन पड़े हैं और यह भाग निश्चित ही पार्श्वनाथ मन्दिर के शिखर भाग से अधिक लुभावना है।

प्रवेश द्वार और गर्भगृह

इस मन्दिर का प्रवेश द्वार अपने समस्त सज्जागत शिल्प-वैभव के साथ अपनी सही स्थिति में अवस्थित है। दोनों ओर गंगा-यमुना और द्वारपाल अंकित हैं। इनके ऊपर कोष्ठकों में जहाँ प्रायः मिथुन का अंकन पाया जाता है, यहाँ उसका अभाव है। मिथुन की जगह यहाँ इन कोष्ठकों में चतुर्भुजी शासन देवियों की उपस्थिति उल्लेखनीय है। इन देवियों के आसन में हिरण, तोता, सिंह और बैल आदि वाहन भी बने हैं। देवियों के दोनों ओर नृत्य गान रत गंधर्व हैं तथा ऊपर के तोरण में भी पाँच कोष्ठक बना कर प्रत्येक में वैसी ही शासन देवियों का अंकन है जिनके हाथों में शंख, कमल, कलश, कुलिश, पाश आदि आयुध हैं। एक देवी बालक को स्तन पान कराती हुई एक हाथ में आम्र मंजरी लिए आम के वृक्ष के नीचे सिंह पर बैठी दिखाई गई है। वह बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ की यक्षी अम्बिका है।

इस द्वार के सबसे ऊपर के तोरण में श्री द्वारा सेवित तीर्थंकर की माता को शयन करते हुए अंकित किया गया है तथा उसके बाद माता के सोलह स्वप्न दिखाए गए हैं। सोलह स्वप्न तो जैन मन्दिरों में अनेक जगह अंकित हैं किन्तु तीर्थंकर की माता का साथ में अंकन इस मन्दिर की विशेषता है।

मन्दिर का गर्भ गृह अत्यन्त सादा है और वेदिका बाद की बनाई गई ज्ञात होती है। दो कमल आकृति पाषाणों को जोड़ कर वह पद्मशिला बनाई गई है जिससे इस गर्भालय की सुन्दर छत का निर्माण हुआ है।

पार्श्वनाथ मन्दिर की तरह इस मन्दिर की मूल प्रतिमा भी स्थानांतरित हो चुकी है और वर्तमान में काले पाषाण की वृषभ चिह्नांकित जटाधारी भगवान आदिनाथ की जो प्रतिमा यहाँ विराजित है वह बाद में स्थापित की गई है। इस पर भी संवत् १२१५ का शिलालेख है।

इस प्रकार यह मन्दिर छोटा होकर भी अपने आप में स्थापत्य की अनेक विधाओं को लिए हुए मध्यकालीन कला का एक श्रेष्ठ उदाहरण है।

स्रोत

यह लेख शोध-पत्रिका ‘अनेकान्त’ के वर्ष 17, अंक 6 (February 1965) में प्रकाशित हुआ था। मूल मुद्रित पृष्ठ सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट के डिजिटल संग्रह ‘पत्रिका’ में सुरक्षित हैं — पत्रिका पर मूल लेख देखें।

प्रस्तुति: पुराने मुद्रित पाठको डिजिटल रूपमें लाते समय केवल छपाई और स्कैनकी त्रुटियाँ सुधारी गई हैं; लेखकके शब्द और उस समयकी वर्तनी यथावत् रखी गई है। उपशीर्षक पाठकोंकी सुविधाके लिए जोड़े गए हैं।