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Research Articles

खान-पानादिका प्रभाव

‘जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन’ — इस पुरानी कहावतको लेखक सच्ची घटनाओंसे पुष्ट करते हैं और बताते हैं कि आहार, वस्त्र तथा स्थान और वातावरणकी शुद्धि साधकके लिए क्यों आवश्यक है।

‘खान-पानादिका प्रभाव’ — अनेकान्त (1957) से हीरालाल सिद्धान्तशास्त्री का लेख
Samyakgyan Prachar-Prasar Trust
In this article
  1. मांस खानेसे बदला स्वभाव
  2. भोजन पर संस्कारोंका प्रभाव
  3. वस्त्र और स्थानका प्रभाव
  4. द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी शुद्धि
  5. स्रोत

अपने देशकी यह बहुत पुरानी कहावत है— जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन, जैसा पीवे पानी, वैसी बोले वानी।

अर्थात् खाने-पीनेकी वस्तुओंका असर मनुष्यके मन पर पड़ा करता है। पर आजकल लोग इन बातोंको दकियानूसी बताने लगे हैं और खाने पीनेकी मर्यादा जो हमारे घरोंमें पीढ़ियोंसे चली आ रही थी, उसे तोड़कर स्वच्छन्द आहारविहारी बनते जा रहे हैं। खाने-पीनेकी वस्तुओंका प्रभाव कितना अमिट होता है इसके दिखानेके लिए दो एक घटनाएं नीचे दी जाती हैं—

मांस खानेसे बदला स्वभाव

पंजाबके एक सौम्यमूर्ति क्षत्रिय-बन्धु बचपनसे निरामिषभोजी थे। वे अत्यन्त मिलनसार और हंसमुख व्यक्ति थे। उन्होंने कभी भी मांस नहीं खाया था और न उनके घरवाले ही खाते थे। गत दूसरे महायुद्धके समय वे फौजमें भर्ती होकर युद्धके मोर्चे पर गये। परिस्थितिवश वहां उन्हें मांस खाना पड़ा। धीरे-धीरे उन्हें मांस खानेका चस्का लग गया और शराब पीनेकी आदत भी पड़ गई। जब युद्ध बन्द हो गया तो वे लौटकर घर आये। लोग यह देखकर दंग रह गये कि उनका स्वभाव एक दम बदल गया है। जहां वे पहले अत्यन्त मिलनसार और दश आदमियोंमें बैठने वाले थे, वहां अब वे अत्यन्त रूक्ष-स्वभावी हो गये थे। बात-बात पर क्रोधित हो लाल-पीले हो जाते थे। लोगों से मिलना-जुलना तो एकदम ही नापसन्द हो गया था। अन्न खाना तो बरायनाम रह गया था, रोजाना नई-नई किस्मके मांस खाते और शराबमें सराबोर होकर अपने कमरे में मस्त होकर पड़े रहते थे। एक दिन उनके एक घनिष्ट मित्र जो आजकल दिल्लीके एक कालेजमें प्रोफेसर हैं, उनसे मिलनेके लिये गये, तो उनकी उक्त दशा देखकर आश्चर्यसे स्तम्भित रह गये। जहां पहले उनका चेहरा अत्यन्त सौम्य था और बाल घुंघराले थे; वहां अब वे अत्यन्त रौद्र मुख दीखने लगे थे और बाल तो सूअरके समान मोटे और खड़े हो गये थे। उक्त प्रोफेसर साहबको उनकी यह दशा देखकर अत्यन्त दुःख हुआ और उनके गर्म मिजाजको देखकर उनसे कुछ भी कहनेका साहस नहीं हुआ।

यह एक सत्य घटना है। मांस-भोजी और शाकाहारी पशुओंमें एक जबर्दस्त भेद स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। मांसभोजी शेर, चीते, बाघ आदि जानवर अत्यन्त क्रूर स्वभावी और एकान्तप्रिय होते हैं, जबकि शाकाहारी गाय, हरिण आदि अत्यन्त शान्त स्वभावी और संघप्रिय होते हैं, वे अपने समाजके साथ ही रहना पसन्द करते हैं। उक्त महाशय जब शाकाहारी थे, उनमें शाकाहारियोंके गुण थे और अब मांस-भोजी हो जानेपर उनमें मांस-भोजी जानवरों जैसे दोष प्रविष्ट हो गये।

भोजन पर संस्कारोंका प्रभाव

एक और भी सच्ची घटना सुनिये—एक सज्जनने बताया कि वे एक बार पर्युषण पर्वमें षट-रस-विहीन भोजन कर अत्यन्त निर्मल परिणामोंके साथ धर्म साधन कर रहे थे। चूंकि वे वहां अतिथि बनकर गये थे, इसलिये प्रति दिन नये-नये घर पर भोजन करने जाना पड़ता था। एक दिन उस रूखे-सूखे भोजनके करने पर भी रातमें उन्हें अत्यन्त काम-विकार जागृत हुआ और नींद लगते ही स्वप्नदोष भी हो गया। दूसरे दिन उन्होंने अपने अत्यन्त निजी मित्रोंसे उस व्यक्तिके आचरण-बाबत पूछ-ताछ की, तो पता लगा कि स्त्री और पुरुष दोनों ही आचरण-भ्रष्ट हैं—स्त्री व्यभिचारिणी और पुरुष व्यभिचारी हैं। उक्त सज्जन आश्चर्य-चकित हुए कि एक व्यभिचारी मनुष्यके अन्नसे व्यभिचारिणी स्त्री-द्वारा बनाये गये भोजनका कितना प्रभाव एक ब्रह्मचारी मनुष्य पर पड़ता है।

आजकल लोग दिन पर दिन शिथिलाचारी होते जाते हैं और हर एक आदमीके हाथकी बनी हुई वस्तुको जहां कहीं भी बैठकर जिस किसी भी समय पर खाया-पीया करते हैं। यही कारण है कि उनका दिन पर दिन नैतिक पतन होता जा रहा है। जो वस्तु जितने कुत्सित संस्कारी व्यक्तिके द्वारा उपार्जित होगी और जितने हीनाचारी व्यक्तिके द्वारा तैयार की जाएगी, उन दोनोंके कुत्सित संस्कारोंका प्रभाव उस वस्तु पर अवश्य पड़ेगा। लेकिन उसके खाने पर उसका अनुभव उसी व्यक्तिको होता है, जिसका आचार-विचार शुद्ध है और खान-पान भी शुद्ध है। जिसका चित्त आर्त-रौद्र ध्यानसे रहित एवं धर्मध्यानरूप रहता है।

वस्त्र और स्थानका प्रभाव

खान-पानकी चीजोंके समान वस्त्र और स्थानका भी प्रभाव मनुष्यके ऊपर पड़ा करता है। इस विषयमें इसी दिसम्बर मासके “कल्याण” में प्रकाशित उदासीन सन्त अनन्त श्री स्वामी रमेशचन्द्रजी महाराजके अनुभव ज्ञातव्य हैं। जिन्हें कल्याणसे यहां साभार उद्धृत किया जाता है—

दूसरे के वस्त्रों का प्रभाव

“आजकल लोग कहते हैं कि चाहे जिसका खा लो, पी लो और चाहे जिसका वस्त्र पहन लो, कोई हानि नहीं है। पर ऐसी बात नहीं है—मेरे जीवनकी एक घटना है। सन् १९४६ की बात है कि मैं एक बार लायलपुर, पंजाबमें गया हुआ था। वहां मैं एक रात्रिको श्री सनातनधर्मसभाके स्थान पर जाकर सोया। मैंने वहांके चपरासीको बुलाकर उससे कहा कि मुझे रात्रिको यहीं पर सोना है, इसलिए मुझे कोई बिलकुल ही नया विस्तरा लाकर दो। चपरासीने मुझे एक बिलकुल ही नया विस्तरा लाकर दे दिया। मैं उस नये विस्तरेको बिछाकर सो गया। सोनेके पश्चात् सारी रात मुझे स्मशानघाटके स्वप्न आते रहे और मुर्दे आते तथा जलते दिखलायी पड़ते रहे। प्रातःकाल उठने पर मुझे बड़ी चिन्ता हुई कि आज ऐसे बुरे स्मशानघाटके स्वप्न क्यों मुझे दिखलाई पड़े। मैंने तुरन्त ही उस चपरासीको अपने पास बुलाकर उसे पूछा—‘भाई! बताओ, तुम मेरे सोनेके लिए यह विस्तरा कहांसे लाये थे?’ उत्तरमें चपरासीने कहा कि ‘महाराज! एक सेठजीकी माता मर गयीं थी, उन सेठजीने अपनी मरी हुई माताके निमित्त यह नया विस्तरा दानमें दिया था, वही मैंने आपको लाकर दे दिया।’ मैं समझ गया कि दान चूंकि प्रेतात्माके निमित्त दिया गया था, इसलिए उस दान किये हुए विस्तरमें भी प्रेत-भावना प्रवेश कर गयी और इसीसे मुझे रात भर स्मशानघाटकी बातें दिखलाई पड़ती रहीं। इससे यह सिद्ध होता है कि जो कर्म जिस भावनासे किये जाते हैं, उसके संस्कार उसमें जाग्रत रहते हैं। इसलिए सबके हाथका खाना-पीना और सबके वस्त्रोंको काममें लेना कदापि उचित नहीं है।”

स्थान या वातावरण का प्रभाव

“वातावरण और स्थानका भी मन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। जिस स्थानपर जैसा काम किया जाता है, वहां पर वैसा ही वातावरण उत्पन्न हो जाता है। इसका अपना अनुभव इस प्रकार है—मैं एक बार ऋषिकेश गया था और वहां एक रातको एक आश्रममें जाकर ठहरा। सो जाने पर मुझे रातभर पटवारियोंके सम्बन्धके स्वप्न आते रहे और कभी जमाबंदीकी बातें, तो कभी हिसाब-किताबकी बातें, जो पटवारी किया करते हैं, दिखलायी पड़ती रहीं। प्रातःकाल जागने पर मैं उस आश्रमके प्रबन्धकके पास गया और मैंने उनसे पूछा कि आपके इस स्थान पर सबसे पहले कौन आकर रहते थे? प्रबन्धकजीने बताया कि महाराज, इस स्थान पर ५-६ दिनों तक बराबर बहुतसे पटवारी आकर रहे थे और वे यहां पर जमाबंदीका काम करते रहे थे। मैं समझ गया कि बस, उन्हीं पटवारियोंके संस्कार इस कमरेमें रह गये हैं, जो मुझे रात भर सताते रहे। जहां मनकी सूक्ष्मता थी, वहीं उनका प्रभाव भी प्रकट हुआ। अतः हमारा मन चाहे जिस जगह बैठकर शुद्ध और स्थिर रह सकेगा, यह सोचना गलत है। सोच-समझकर और पवित्र वातावरण वाले स्थान में रहकर भजन-पूजन करनेसे ही मन लगेगा और लाभ हो सकेगा। जहां मांसाहारी रहते हों, जहां मांस-मछली, अंडे मुर्गे खाये जाते हों, और जहां गोभक्षक लोग रहते हों, तथा जहां अश्लील गन्दे गाने गाये जाते हों, व्यभिचार होता हो, वहां भला मन कैसे शुद्ध रह सकता है और कैसे भजन बन सकता है।”

(कल्याण, दिसम्बर १९५६)

द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी शुद्धि

ऊपरके उद्धरणसे पाठक सहजमें ही जान सकेंगे कि खाने पीनेकी चीजोंके समान ओढ़ने पहननेके वस्त्रोंका और स्थानका भी असर हम पर पड़ता है। मनुष्यके जैसे पवित्र भाव तीर्थ क्षेत्रों पर होते हैं, वैसे अन्यत्र नहीं। इसका कारण यह है कि जिस भूमि पर रह कर साधु-सन्तों एवं तीर्थंकरादि महापुरुषोंने विश्वके कल्याणकी भावना की है, उनके पवित्र भावोंका असर वहांके पार्थिव परमाणुओं और वातावरण पर पड़ता है। उस स्थान पर जब कोई दूसरा व्यक्ति पहुँचता है, तब उसके मन पर उसका असर पड़ता है और उसकी बुरी और संक्लेश-पूर्ण मनोवृत्ति बदलने लगती है। इसके विपरीत जिस स्थान पर लोग निरन्तर जुआ खेलते रहते हैं, जहां वेश्याएँ और व्यभिचारिणी स्त्रियां दुराचार करती रहती हैं, वहांका वातावरण भी दूषित हो जाता है, और वहां जाने पर निर्मल मनोवृत्ति वाले भी मनुष्योंके मन मलिन होने लगते हैं। यही कारण है कि साधक एवं आराधकको द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की शुद्धि सर्वप्रथम आवश्यक बतलाई गई है।

स्रोत

यह लेख शोध-पत्रिका ‘अनेकान्त’ के वर्ष 14, अंक 6 (Magha 1957) में प्रकाशित हुआ था। मूल मुद्रित पृष्ठ सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट के डिजिटल संग्रह ‘पत्रिका’ में सुरक्षित हैं — पत्रिका पर मूल लेख देखें।

प्रस्तुति: पुराने मुद्रित पाठको डिजिटल रूपमें लाते समय केवल छपाई और स्कैनकी त्रुटियाँ सुधारी गई हैं; लेखकके शब्द और उस समयकी वर्तनी यथावत् रखी गई है। उपशीर्षक पाठकोंकी सुविधाके लिए जोड़े गए हैं।