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Research Articles

कुलपाक के माणिक स्वामी

डा० विद्याधर जोहरापुरकर के लेख की चर्चा करते हुए कुलपाक के माणिक स्वामी पर अतिरिक्त जानकारी: कन्नड कवि नागव की 'माणिकचरिते' की कथा, उसकी ऐतिहासिकता और कुलपाक के दिगम्बर क्षेत्र होने के प्रमाण।

‘कुलपाक के माणिक स्वामी’ — अनेकान्त (1968) से के० भुजबली शास्त्री का लेख
Samyakgyan Prachar-Prasar Trust
In this article
  1. कन्नड कवि नागव की 'माणिकचरिते'
  2. माणिक स्वामी की प्रतिमा की कथा
  3. कथा की ऐतिहासिकता: शंकर गंड और अत्तिमब्बे
  4. कुलपाक क्षेत्र की यात्रा और दिगम्बर मूर्तियाँ
  5. कुलपाक सम्बन्धी कन्नड शिलालेख
  6. स्रोत

'अनेकान्त' वर्ष २१ किरण १ (अप्रैल, १९६८) में 'कुलपाक के माणिक स्वामी' शीर्षक से डा० विद्याधर जोहरापुरकर का एक लेख प्रकाशित हुआ है। उस लेख में मान्य लेखक ने अनुमानित तेरहवीं शताब्दी के विद्वान्‌ उदयकीर्ति की अपभ्रंश रचना 'तीर्थ वंदना', चौदहवीं शताब्दी के लेखक जिनप्रभसूरिका 'विविध तीर्थ कल्प', पंद्रहवीं शताब्दी के मराठी लेखक गुणकीर्ति का 'धर्मामृत', पंद्रहवीं या सोलहवीं शताब्दी के लेखक सिंहनन्दि का 'माणिक स्वामी बिनती', सोलहवीं शताब्दी के गुजराती लेखक सुमतिसागर की 'तीर्थजयमाला', सत्रहवीं शताब्दी के लेखक शीलविजय की 'तीर्थमाला', सत्रहवीं शताब्दी के गुजराती लेखक सुमतिसागर की 'तीर्थ जयमाला', सत्रहवीं शताब्दी के गुजराती लेखक ज्ञानसागर की 'तीर्थ वंदना', सत्रहवीं शताब्दी के ही जयसागर की 'तीर्थ जयमाला' और उसी शताब्दी के कारंजा के भट्टारक जिनसेन का 'मान्यता विवरण' इन कृतियों के आधार पर कुलपाक के माणिक स्वामी पर प्रकाश डाला है।

विद्याधर जी का कहना है कि इस समय क्षेत्र पूर्णतः श्वेताम्बर संप्रदाय के अधिकार में है। पर उपर्युक्त कृतियों के वर्णनों से स्पष्ट है कि मध्य युगमें दिगम्बर भी यात्रा को यहाँ पर बराबर जाते रहे हैं। जहाँ के मंदिर के सभागृह में मुख्य मूर्ति माणिक स्वामी के अतिरिक्त, अन्य बारह भव्य अर्ध पद्मासन मूर्तियां भी हैं और उनकी शिल्प शैली दक्षिणी भारत के श्रवण बेलगोल, कारकल, मूडबिद्री आदि स्थानों की मूर्तियों के समान ही है। साथ ही साथ लेखक यह भी कहते हैं कि मूर्तियों के पाद पीठों पर प्रतिष्ठा सम्बन्धी लेख अवश्य ही रहे होंगे। पर इनके पैरों तक सीमेन्ट प्लास्टर किये जाने के कारण आज पाद पीठ नष्ट प्राय हो गये हैं।

कन्नड कवि नागव की 'माणिकचरिते'

अब कुलपाकके माणिक स्वामी के सम्बन्ध में मुझे भी कुछ कहना है। वह निम्न प्रकार है: कुलपाक या कोल्लिपाक से सम्बन्ध रखने वाली एक रचना कन्नड भाषा में भी है। इसके रचयिता जैन कवि नागव हैं। इनका समय ई० सन्‌ १७०० वीं शताब्दी है। कवि नागव की इस रचना का नाम 'माणिकचरिते' है। इस कथा का सम्बन्ध रामायण से जोड़ा गया है। बहुत कुछ संभव है रामायण और महाभारत जनप्रिय महाकाव्य होने के कारण ऐसा किया गया हो। वस्तुतः यह एक ऐतिहासिक घटना है। कथा का सार इस प्रकार है:

माणिक स्वामी की प्रतिमा की कथा

एक दिन देवेन्द्र रजतगिरि के रत्न खचित जिन मंदिरों का दर्शन कर पुष्पक विमान पर लौट रहा था। अकस्मात्‌ पुष्पक विमान बीच में रुक गया। तब देवेन्द्र ने नीचे देखा। नीचे लंकाधीश रावण की पत्नी मंदोदरी लंका नगर के बाहर, शांतीश्वर के मंदिर में बड़ी भक्ति से पूजा कर रही थी। देवेन्द्र उसे देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। तत्क्षण वह विमान से उतर कर पूर्वोक्त जिन मंदिर में गया। मंदिर के दर्शन करने के उपरांत देवेन्द्र ने मंदोदरी से कहा कि मैं तुम्हारी भक्तिसे बहुत खुश हूँ। इसलिये तुम कोई अभीष्ट वस्तु मांगो। मंदोदरी ने उसका उत्तर दिया कि मुझे किसी भी चीजकी कमी नहीं है। हाँ स्वर्ग में आपके द्वारा पूजी जाने वाली जिन प्रतिमा को आप मुझे दे दें तो बड़ी कृपा होगी। तब देवेन्द्र ने मंदोदरी को सानंद मरकत रत्न निर्मित अपनी जिन प्रतिमा को दे दिया। इस जिन प्रतिमा को मंदोदरी बड़ी भक्ति से बराबर पूजती रही। राम-रावण के युद्ध काल में डर कर मंदोदरी ने इस प्रतिमा को समुद्र में डाल दिया। इसके बाद की कथा सुनिये।

एक दिन एक भील ने राजा शंकर गंड से निवेदन किया कि प्रातःकाल मध्यान्ह और सायंकाल तीनों काल समुद्र में हाव-भाव के साथ दर्शन देने वाली और डूबने वाली जिन प्रतिमा का एक बार आप अवश्य दर्शन करें। इस बात को सुनकर दूसरे दिन शंकर गंड अपने मंत्री एवं पुरवासियों के साथ समुद्र तीर में जाकर वहाँ से नाव के द्वारा प्रतिमा स्थित स्थान पर पहुँचा। वहाँ पर भील की बात यथार्थ निकली। बाद सूर्यास्त के समय पर राजा शंकर गंड अपने महल में लौट आया। पर उसके मन में उक्त प्रतिमा को लाकर पूजा करने की बलवती अभिलाषा सताने लगी। उसी दिन रात को निद्राधीन शंकर गंड से यक्षी ने आकर कहा कि तुम्हारे राज्य की किसी सुशीला, पतिव्रता स्त्री की सहायता से सागर स्थित वह प्रतिमा महल में लाई जा सकती है। पर लाते समय उक्त प्रतिमा को तुम मुड़कर मत देखना। अगर देखोगे तो प्रतिमा उसी स्थान पर स्थिर हो जायगी अर्थात्‌ आगे नहीं जावेगी। दूसरे दिन राजा शंकर गंडने अपने आस्थान में गत रातकी घटना को कह सुनाया। तब मंत्रियों ने राजा से निवेदन किया कि अपने नगर में किसी पतिव्रता स्त्री का पता लगाना चाहिये। इसके लिये सुवर्ण मुद्राओं के साथ मुनादी करना ही सबसे उत्तम उपाय है। इसी प्रकार किया गया।

इस मुनादी को धनदत्त श्रेष्ठी की पत्नी गुणवती के नौकराना ने सुना और उसने राज दूतों से बहुमान स्वरूप उन सुवर्ण मुद्राओं को लेकर वह अपनी स्वामिनी के पास पहुँचा। मुनादी की बातों को सुनाकर वह गुणवती से कहने लगा कि इस महत्वपूर्ण धर्म कार्य के लिये आप ही सर्वथा योग्य हैं। क्योंकि मैं आपकी पातिव्रत्य की महिमा को कई बार देख चुका हूँ। बाद नौकराना के आग्रह से गुणवतीको उस बहुमानको स्वीकार करना पड़ा। राजाज्ञा के अनुसार दूसरे दिन प्रातःकाल गुणवती स्नान आदि से शुचिभूत होकर सुवर्ण थाल में पूजा द्रव्य लेकर अपने पूज्य पति तथा नौकराना के साथ राजमहल में पहुँची। वहाँ से राजा शंकर गंड अपनी रानियों, मंत्री, सेनानायक, सेना हाथी, घोड़ा, बाजा आदि के साथ बड़े धूम-धाम से निकला और ठीक समय पर समुद्र तीर में पहुंचा। उसी समय सती गुणवती संकेत पाकर अपने पातिव्रत्य के बलसे पानी के ऊपर पैदल ही जिन प्रतिमा के पास पहुँची। वहाँ पर बड़ी भक्ति से भगवान की पूजा कर स्तुति-स्तोत्र पूर्वक उक्त प्रतिमा को भक्ति से शिर पर उठा लायी। तीर में पहुँचते ही एक नवीन विशिष्ट गाड़ी पर मूर्ति को विराजमान कर सभी नगर की ओर बढ़े। चलते-चलते नगर जब ८-१० मील पर रह गया था, तब अकस्मात्‌ वह गाड़ी रुक गयी। उस समय पूर्व के स्वप्न की सूचना को भूल कर शंकर गंड ने मुड़ कर पीछे देखा। फल स्वरूप वह माणिक स्वामीकी प्रतिमा वहीं पर स्थिर हो गयी। उस स्थान का नाम कुलपाक या कोलिपाक था। निरुपाय हो उसी स्थान पर राजा के द्वारा पूर्वोक्त प्रतिमा को स्थापित करना पड़ा। यही संक्षेप में पूर्वोक्त रचना का सार है। अब इस कथा को ऐतिहासिक दृष्टि से देखना है।

कथा की ऐतिहासिकता: शंकर गंड और अत्तिमब्बे

उक्त कुलपाक एक जमानेमें कर्णाटकमें शामिल रहा। पूर्वोक्त कथामें प्रतिपादित राजा शंकर गंड दशवीं शताब्दीके उत्तरार्ध में राज्य करने वाला एक ऐतिहासिक व्यक्ति था। वह राष्ट्रकूट चक्रवर्ती तृतीय कृष्ण का महासामन्ताधिपति होकर बनवासिमें शासन करता रहा। उसी समय उपर्युक्त कृष्ण के आस्थान-महाकवि पोन्न को 'उभय भाषा कवि चक्रवर्ती' की उपाधि एवं उसी कृष्ण मांडलिक अरिकेसरी के आस्थान में सेनानायक तथा कवि के रूप में विराजने वाले महाकवि पंप को 'कविता गुणार्णव' की उपाधि दी गयी थी। थोड़े ही समय के बाद चालुक्य चक्रवर्ती तैलपदेवने महाकवि रन्नको अपने आस्थान में बुलाकर, 'कविचक्रवर्ती' की उपाधि से समलंकृत किया था। महाकवि इस रन्न ने अपने सुप्रसिद्ध महाकाव्य 'अजितनाथपुराण' में, अपनी पोषिका अत्तिमब्बे को स्मरण करने वाले पद्य में ही इन महाकवियों के समय में ही वर्तमान शंकर गंड को भी एक प्रतिष्ठित धार्मिक व्यक्ति के रूप में स्मरण किया है। शंकर गंड और अत्तिमब्बे के वयोमान में अन्तर होने पर भी ये दोनों समकालीन रहे। पूर्वोक्त कथा में एक व्यापारी की पत्नी के रूप में प्रतिपादित सती गुणवती संभवतः 'गुणदककीर्ति' उपाधि प्राप्त दानचिंतामणि अत्तिमब्बे ही हो सकता है। क्योंकि उपर्युक्त कथा एक व्यापारी के द्वारा जनश्रुति के आधार पर ७०० वर्षों के बाद लिखी गयी है। धारवार जिले के लक्कुंडि के शासन में अन्यान्य अतिशयों के साथ-साथ अत्तिमब्बे के द्वारा नदी से एक जिन प्रतिमा को उठा लाने का उल्लेख भी पाया जाता है। […]वीं शताब्दी के श्रवण बेल्गोल के शिलालेख में भी अत्तिमब्बे से सम्बन्ध रखने वाली इन बातों का उल्लेख विस्तार से मिलता है। पूर्वोक्त समुद्र तीर गोदावरी जहाँ बंगाल समुद्र में जा मिलता है वही स्थान हो सकता है। क्योंकि कवि नागव ने शंकर गंड को ओरगल्लु निवासी बतलाया है। ओरगल्लु और कुलपाक ये दोनों गोदावरी के ही पास हैं। इसीलिये इस क्षेत्र का नाम कुलपाक की अपेक्षा कोल्लिपाक अधिक सुसंगत जँचता है। क्योंकि कोल्लि शब्द का अर्थ है खाड़ी।

कुलपाक क्षेत्र की यात्रा और दिगम्बर मूर्तियाँ

अस्तु, सितम्बर १९५८ में हैदराबाद से ४५ मील दूर पर स्थित, कुलपाक को स्वयं गया हूँ। वहाँ के जिनालय, प्राचीन मूर्तियां, भूगर्भ से उपलब्ध अन्यान्य स्मारक इन सब वस्तुओं के देखने से मुझे भी विश्वास हुआ कि यह क्षेत्र श्वेताम्बरों के अधिकार में आने के पूर्व दिगम्बर क्षेत्र ही रहा है। यद्यपि इधर श्वेताम्बर भाइयों ने मंदिर और मूर्तियों में विशेष परिवर्तन कर लिया है। फिर भी मंदिर के शिखर पर आज भी अनेक मूर्तियां दिगम्बर मुद्रा में ही दृष्टि गोचर होती हैं। भूगर्भ से प्राप्त मूर्तियां भी दिगम्बर मुद्रा में ही वर्तमान हैं। जिनालय में विराजमान अन्यान्य विशालकाय मनोज्ञ मूर्तियां दक्षिण भारत के अन्यान्य मंदिरों में अधिक परिमाण में उपलब्ध होने वाली दिगम्बर संप्रदाय की मूर्तियों की तरह अर्धपद्मासन में ही विद्यमान हैं। विद्याधर जी का कहना यथार्थ है कि इस समय मूर्तियों के लेख बिलकुल नजर नहीं आते हैं। पूर्व में मूर्तियों में लेख अवश्य रहे होंगे। आज भी मंदिर में अर्धपद्मासनस्थ नीलरंग वाली ऋषभ भगवान्‌ की मूर्ति विराजमान है। मूर्ति बहुत मनोज्ञ है।

कुलपाक सम्बन्धी कन्नड शिलालेख

मैं कुलपाक के मंदिर को देखने के बाद हैदराबाद में स्थित आन्ध्र प्रदेशीय पुरातत्त्व विभाग के अध्यक्ष डा० पी० श्री निवासाचार्य से मिला था। आप सुयोग्य विद्वान हैं। वे बहुत प्रेम से मिले। अन्यान्य बात-चीत के सिलसिले में मैंने उनसे कुलपाक क्षेत्र के सम्बन्ध में भी चर्चा की। उस पर उन्होंने यों कहा कि कुलपाक मूल में दिगम्बर संप्रदाय के अधिकार में ही रहा। यह वस्तुतः दिगम्बर संप्रदाय की ही तीर्थ है। इस बात को समर्थन करने वाले अनेक कन्नड शिलालेख मिले हैं। वे शिलालेख पुरातत्त्व विभाग की ओर से शीघ्र ही प्रकाशित होने वाले हैं। प्रकाशित होने के बाद उन शिलालेखों को आप के पास भेज दूँगा। पर बाद में यह बात मेरे दिमाग से एकदम उतर गयी। 'अनेकान्त' के इस लेख को देखने के बाद ही पूर्वोक्त बात याद आयी। खैर इस समय कुलपाक के सम्बन्ध में इतना ही कहना है। पूर्वोक्त कन्नड शिलालेखों को प्राप्त करने के उपरांत फिर मैं लिखूँगा।

स्रोत

यह लेख शोध-पत्रिका ‘अनेकान्त’ के वर्ष 21, अंक 3 (August 1968) में प्रकाशित हुआ था। मूल मुद्रित पृष्ठ सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट के डिजिटल संग्रह ‘पत्रिका’ में सुरक्षित हैं — पत्रिका पर मूल लेख देखें।

प्रस्तुति: पुराने मुद्रित पाठको डिजिटल रूपमें लाते समय केवल छपाई और स्कैनकी त्रुटियाँ सुधारी गई हैं; लेखकके शब्द और उस समयकी वर्तनी यथावत् रखी गई है। उपशीर्षक पाठकोंकी सुविधाके लिए जोड़े गए हैं।