पतियान दाई (एक भूला बिसरा जैन मन्दिर)
सतना के पास सिन्दूरिया पहाड़ी पर खड़ा ‘पतियान दाई’ नामक छोटा पर सुरक्षित गर्भालय, जिसे पुरातत्त्व की चर्चा में शक्ति मंदिर कहा गया है — लेखक उसे उत्तर गुप्तकाल का पद्मावती मंदिर मानते हैं।

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मध्य प्रदेश के सतना जिले में सतना नगर से दक्षिण-पश्चिम लगभग ६ मील पर सिन्दूरिया पहाड़ नाम से एक सुन्दर पहाड़ी है जिसका विस्तार पूरब-पश्चिम है।
उसी पहाड़ी के एक साधारण ऊँचे टीले पर एक भग्न मंदिर का छोटा परन्तु पूर्ण सुरक्षित और सुन्दर गर्भालय खड़ा है जिसे आस पास के लोग ‘डुबरी की मढ़िया’ या ‘पतियान दाई’ के नाम से जानते हैं।
पुरातत्व की चर्चा में इस मन्दिर का उल्लेख शक्ति मंदिर के नाम से किया गया है और इस क्षेत्र से एकाधिक बार अनमोल मूर्तियां ढोकर ले जाने वाले तथाकथित पुरातत्व ज्ञाता अन्वेषकों ने अद्यावधि न केवल इस महत्त्वपूर्ण स्थान की घोर उपेक्षा की है वरन् इस मन्दिर की एकमात्र सुन्दर देवी-मूर्ति भी स्थानांतरित करके इस स्थान को अस्तित्व-विहीन बना देने के प्रयास में भी संकोच नहीं किया।
यह तो इस गर्भगृह की निर्माण शैली का प्रभाव है कि अपना सर्वस्व खोकर भी आज तक यह खण्डहर अपनी गौरव गरिमा से मस्तक उठाए खड़ा हुआ है, और यद्यपि यहाँ से जो देवी-मूर्ति उठाकर ले जाई गई है, वह देख पाने का सौभाग्य मुझे अभी तक प्राप्त नहीं हुआ परन्तु फिर भी इन्हीं अवशेषों में मुझे ऐसे प्रमाण प्राप्त हो गए हैं जिनके आधार पर मैं इसे जैन मन्दिर कहने का साहस कर पा रहा हूँ।
गर्भालय की माप और छत
यह समूचा मन्दिर बाहर से ६॥ फुट लम्बा, ६॥ फुट चौड़ा और ७॥ फुट ऊँचा है। यह ऊँचाई सीढ़ी के ऊपर से लेकर छत की ऊपरी कोर तक की है। भीतर से इस गर्भालय की लम्बाई साढ़े चार फुट, चौड़ाई पांच फुट, एवं ऊँचाई ६ फुट रह जाती है। चारों दीवारों को एक आठ इंच मोटे चौकोर शिला खण्ड से ढक कर छत का निर्माण किया गया है जिसने इस बनावट को बहुत अधिक मजबूत कर दिया है। इस स्थान को इसी दशा में अब तक सुरक्षित रखने में सचमुच इस छत के शिला खण्ड का योग महत्त्वपूर्ण है।
द्वार पर गंगा-यमुना और यक्ष-मूर्तियाँ
मंदिर का सामना उत्तर की ओर है और उसी ओर उसका एक मात्र द्वार है जो केवल दो फुट चौड़ा और साढ़े तीन फुट ऊँचा है। द्वार के दोनों ओर सवा फुट ऊँची गंगा यमुना की मूर्तियाँ कलश लिए हुए—भावपूर्ण मुद्रा में अंकित हैं। दोनों देवियों के वाहन के रूप में मकर और कूर्म का स्पष्ट अंकन है। इन मूर्तियों के एक हाथ में कलश तथा दूसरे हाथ में चमर अंकित किया गया है जो इस मंदिर की विशेषता है। देवियों के खड़े होने की मुद्रा विशेष कला-पूर्ण है और शरीर के त्रिभंग को इस संयम के साथ उभारती है कि उसकी प्रतिकृति करने में खजुराहो का कलाकार भी असफल रहा प्रतीत होता है।
इन दोनों प्रतिमाओं के मुकुट, कुण्डल, रत्नहार, किंकिणी, कंगन तथा वस्त्र बड़े सुन्दर बन पड़े हैं, प्रत्येक अंगोपांग, अलंकार, एवं मुद्रा बड़े सुन्दर संयोजन के साथ प्रस्तुत किए गए हैं।
द्वार के दाहिनी ओर, मकर वाहिनी गंगा के पार्श्व में एक चतुर्भुज यक्ष-मूर्ति भामण्डल सहित अंकित है। इस प्रतिमा का एक हाथ खण्डित है, शेष तीन हाथों में क्रमशः गदा, नाग, और शव अंकित किए गए हैं।
बायीं ओर कूर्म वाहिनी यमुना के पार्श्व में भी इसी प्रकार चतुर्भुज यक्ष-मूर्ति भामण्डल सहित दिखाई गई है। इसका भी एक हाथ खंडित है जिसमें किसी चतुष्पद प्राणी की रस्सी रही है, जिसके पैर और पूंछ का आकार अभी भी दिखाई देता है। शेष तीनों हाथों में गदा, कमल पर नाग दिखलाये गए हैं।
तोरण पर तीन दिगम्बर जैन तीर्थंकर
गंगा यमुना के शिरोभाग से द्वार की बराबरी तक सीधे पाषाण पर साधारण बेलि का अंकन है, और द्वार के ऊपर के तोरण पर तीन दिगम्बर जैन तीर्थंकरों का स्पष्ट अंकन किया गया है, जो इस मन्दिर को जैन मन्दिर सिद्ध करता है।
द्वार पर के इस तोरण में दोनों छोरों पर तथा मध्य में, दो-दो स्तम्भों की सहायता से तीन अतीव सुन्दर कोष्ठकों का निर्माण हुआ है। इनमें से मध्य के कोष्ठक में वृषभ चिह्नांकित युगादि देव भगवान आदिनाथ की सुन्दर प्रतिमा उत्कीर्णित है तथा दोनों ओर के कोष्ठकों में भगवान पार्श्वनाथ की फणावलि सहित प्रतिमाएँ बनी हैं। ये तीनों मूर्तियां ५ इंच ऊँची पद्मासन विराजमान हैं। सौम्यता, मनोज्ञता और शारीरिक अनुपात की दृष्टि से ये प्रतिमाएँ सुन्दर हैं।
पद्मावती-मंदिर होने के आधार
इस मंदिर के भीतर एक सुन्दर और सुसज्जित देवी प्रतिमा विराजमान थी जो अभी लगभग बीस वर्ष पूर्व यहां से हटाई गई है, अस्तु इस आधार पर मेरा अनुमान है कि यह मंदिर जैन शासन देवियों के स्वतंत्र मंदिरों की श्रृंखला में तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की यक्षी ‘पद्मावती’ का मन्दिर होना चाहिए। इस स्थान का अपभ्रंश नाम पतियान दाई भी इस स्थान को ‘पद्मावती-मंदिर’ मानने की मेरी धारणा की पुष्टि करता है। द्वार के तोरण पर उत्कीर्णित पार्श्वनाथ की दो प्रतिमाओं का अस्तित्व भी इस विश्वास का एक कारण है। जहां तक तोरण पर मध्य में स्थित आदिनाथ की मूर्ति का प्रश्न है, परम मंगल-कर्त्ता आदीश्वर के रूप में ऐसे स्थानों पर उनका अंकन साधारणतः पाया जाता है, परन्तु दोनों ओर पार्श्वनाथ का चित्रण साभिप्राय ही हुआ है।
गुप्तकाल में सतना के आस पास भुमरा के एक मुख शिव, नचना के चतुर्मुख शिव और पार्वती मंदिर तथा सीरा पहाड़ के जिनबिम्बों के निर्माण के काल में धर्मायतनों के माध्यम से कला के प्रदर्शन की—सत्यं शिवम् के साथ सुन्दरम् के सविशेष प्रदर्शन की—होड़ सी लग गई थी। नचना का अति सुन्दर पार्वती मंदिर एवं उसके भग्नावशेष भी इसके प्रमाण हैं। यदि उसी समय जैन-वास्तु निर्माताओं में भी इस भावना ने जोर मारा हो तो इसे स्वाभाविक ही माना जाना चाहिए। जैन मूर्ति-विधान में उपास्य देव की गृहस्थ अवस्था का अंकन या उनके माता-पिता की मूर्तियों का निर्माण कभी प्रचलित नहीं रहा, केवल भित्ति चित्रों में दक्षिण के तिरुपरुत्तिकुनरम—जिन कांची—आदि कुछ स्थानों में ऐसे चित्रण मध्य युग के प्राप्त हुए हैं। ऐसी अवस्था में सम्भवतः कला की अभिव्यक्ति की लौकिक एषणा पूरी करने के अभिप्राय से ही जैनवास्तु-निर्माताओं ने जैन-शासन-देवियों के स्वतन्त्र मंदिरों के निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया होगा।
सतना से लगभग सत्तर मील दूर कटनी के पास बिलहरी नामक स्थान में आदिनाथ की शासन देवी ‘चक्रेश्वरी’ का एक स्वतन्त्र मन्दिर स्थित है जिसका उल्लेख प्रसिद्ध पर्यटक मुनि कांतिसागर जी ने अपनी पुस्तक ‘खण्डहरों का वैभव’ में किया है। बिलहरी का प्राचीन नाम ‘पुष्पावती’ भी कहा जाता है और वहाँ का उपरोक्त मंदिर पूर्व मध्यकाल की कलचूरी कला की देन है।
सम्भवतः सतना का यह पद्मावती मंदिर उक्त चक्रेश्वरी मंदिर से पूर्व का बना है। मेरी इस घोषणा के दो कारण हैं। एक तो यह कि यहां आस-पास गुप्तकालीन अवशेष अधिक पाये जाते हैं और मध्यकाल में यहाँ बहुत कम निर्माण हुआ है, दूसरे उस पद्मावती मंदिर की निर्माण पद्धति भी उस धारणा को पुष्ट करती है।
निर्माण काल: उत्तर गुप्तकाल अथवा पूर्व मध्यकाल
गुप्तकाल के उपरान्त कलाकार की दृष्टि कला की आत्मा से उठकर उत्तरोत्तर कला के शरीर की ओर आकृष्ट होती चली गई है। जैन, शैव, वैष्णव और शाक्त सभी प्रकार के मंदिरों के निर्माण में इस भावना का असर स्पष्ट दिखाई देता है। मध्य युग में दसवीं ग्यारहवीं शताब्दी में—खजुराहो तक आते तो ऐसा लगता है कि सांसारिकता और स्थूल मांसलता ही जैसे कला का ध्येय रह गया हो। कलाकार के मानसिक धरातल की अभिव्यक्ति के उक्त जन-मानस-समर्थित आधार की पृष्ठ भूमि में यदि पद्मावती-मन्दिर का निरीक्षण किया जाय तो उसके निर्माण काल का अनुमान करना आसान हो जायगा।
ऐसा लगता है जैसे सौन्दर्य के पुजारी कलाकार की छेनी पर यहाँ संयम का पहरा था। तत्कालीन साम्राज्य की सीमा का उद्घोषक होने के कारण गंगा-यमुना का अनिवार्य […] करके ही मानों कलाकार ने छेनी को कृत कृत्य मान लिया है। तोरण के नीचे स्तम्भों पर मिथुनयुगल, या भक्ति के व्याज से अप्सराओं का सौन्दर्यांकन उसे तब अभीष्ट नहीं था। गर्भालय भी जितना भीतर अलंकार विहीन है, बाहर भी उतना ही सादा होकर वीतरागता का उद्घोष कर रहा है।
इस प्रकार प्राप्त आधारों पर और साधार अनुमान से मेरी धारणा है कि यह स्थान पद्मावती-मन्दिर ही है और इसका निर्माण उत्तर गुप्तकाल अथवा पूर्व मध्यकाल में हुआ होगा। वहाँ भ्रमण करते हुए एक दिन कोटर की एक झाड़ी में मेरे साथी श्री पन्नालाल को एक आम्रमञ्जरी का अवशेष प्राप्त हुआ है जिसका आलेखन बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ की यक्षी देवी अम्बिका के परिकर में किया जाता है, अतः मुझे आशा है कि इस स्थान पर शोध किये जाने पर संभवतः कुछ और भी सामग्री मिल सकेगी और कालान्तर में इस स्थान की महत्ता सिद्ध हो सकेगी।
स्रोत
यह लेख शोध-पत्रिका ‘अनेकान्त’ के वर्ष 15, अंक 4 (Ashwina 1962) में प्रकाशित हुआ था। मूल मुद्रित पृष्ठ सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट के डिजिटल संग्रह ‘पत्रिका’ में सुरक्षित हैं — पत्रिका पर मूल लेख देखें।
प्रस्तुति: पुराने मुद्रित पाठको डिजिटल रूपमें लाते समय केवल छपाई और स्कैनकी त्रुटियाँ सुधारी गई हैं; लेखकके शब्द और उस समयकी वर्तनी यथावत् रखी गई है। उपशीर्षक पाठकोंकी सुविधाके लिए जोड़े गए हैं।



