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भगवान महावीर की भाषा-क्रान्ति

भगवान महावीर ने पण्डितों की क्लिष्ट भाषा को अस्वीकार कर आम आदमी की लोकभाषा को धर्मोपदेश का माध्यम बनाया — यह युगप्रवर्तक भाषा-क्रान्ति थी। लेखक भाषा की शक्ति और सीमाओं, दिव्यध्वनि तथा इन्द्रभूति गौतम के प्रसंग से इसे समझाते हैं।

‘भगवान महावीर की भाषा-क्रान्ति’ — अनेकान्त (1974) से नेमिचन्द जैन का लेख
Samyakgyan Prachar-Prasar Trust
In this article
  1. भाषा: सुविधा भी, खतरनाक औजार भी
  2. पंडित की भाषा और आम आदमी
  3. धर्म के क्षेत्र में लोक-क्रान्ति
  4. संस्कृत और लोक-भाषाओं का द्वन्द्व
  5. दिव्यध्वनि: सबके पल्ले पड़ने वाली भाषा
  6. भाषा-क्रान्ति: ज्ञान, समझ और आधुनिकता
  7. स्रोत

विगत शताब्दियों में जो भी क्रान्तियां घटित हुई हैं, उनमें भाषा की, अर्थात् माध्यम की क्रान्तियाँ अधिक महत्व की हैं। भाषा का सन्दर्भ बड़ा सुकुमार और संवेदनशील संदर्भ है; यही कारण है कि कुछ लोग उसे जान-बूझकर टाल जाते हैं और कुछ उसकी समीक्षा में समर्थ ही नहीं होते। असल में भाषा संपूर्ण मानव-समाज के लिए एक विकट अपरिहार्यता है। उसका सम्बन्ध सामान्य से विशिष्ट तक बड़ी घनिष्टता का है। उसके बिना न सामान्य जी सकता है न विशिष्ट। इसे भी यह चाहिये, उसे भी। वह एक निरन्तर परिवर्तनशील विकासोन्मुख अनिवार्यता है। ज्यों-ज्यों मनुष्य बढ़ता-फलता है, उसकी भाषा त्यों-त्यों बढ़ती-फलती है। उसका अस्तित्व जीवन-सापेक्ष है, इसीलिए हम उससे बिलकुल बेसरोकार रह नहीं सकते। वह इतनी नजदीक है, इतनी जरूरी है, कि उसकी अनुपस्थिति में जीवन की समग्र साहजिकता ठप्प हो सकती है।

भाषा: सुविधा भी, खतरनाक औजार भी

जीवन का हरेक क्षण भाषा के बहुविध संदर्भों में साँस लेता है। भाषा जहाँ एक ओर सुविधा है, वहीं दूसरी ओर उसने अपने प्रयोक्ता से ही इतनी शक्ति अर्जित कर ली है कि वह एक खतरनाक औजार भी है। उसमें सृजन, सुविधा और संहार तीनों स्थितियाँ स्पन्दित हैं। बहुधा यही होता है कि भाषा के दो पक्ष वक्ता-श्रोता पूरी तरह कभी जुड़ नहीं पाते हैं; संप्रेषण की प्रक्रिया में सारी सावधानी के बावजूद भी कुछ रह जाता है जिस पर वक्ता-श्रोता दोनों को पछताना होता है। वह पास लाकर भी सारी दूरियों का समाधान नहीं कर पाती।

पंडित की भाषा और आम आदमी

भगवान महावीर ने भाषा की इस असमर्थता को गहराई से समझा था। उन्होंने अनुभव किया था कि एक ही भाषा के बोलने वालों के बीच ही भाषा ने दूरियाँ पैदा कर ली हैं। सामान्य और विशिष्ट एक ही युग में दो भाषाओं का उपयोग करते हैं; यद्यपि मूलतः वे दोनों एक ही होती हैं। स्रोत में एक; किन्तु विकास-स्तरों पर दो भिन्न सिरों पर। महावीर ने अपने युग में भाषा की इस खाई को, इस कमजोरी को जाना—उन्होंने देखा। पंडित बोल रहा है, आम आदमी उसके आतंक में फँसा हुआ है।

उसकी समझ में कुछ भी नहीं है, किन्तु पण्डितवर्ग उस पर थोपे जाता है स्वयं को। दोनों एक ही जमाने में अलग-अलग जीवन जी रहे हैं। महावीर को यह असंगति कचोट गई। उन्होंने आम आदमी की पीड़ा को पकड़ा और उसी की भाषा को अपने जीवन की भाषा बनाया, क्योंकि उनके युग तक धर्म का, दर्शन का जो विकास हो चुका था वह भाषा की क्लिष्टता और परिभाषाओं के बियाबान में भटक गया था। आम आदमी इच्छा होते हुए भी अध्यात्म की गहराइयों में भाषा की खाई के कारण उतर नहीं पाता था। महावीर ने आम आदमी की इस कठिनाई को माना, समझा और अध्यात्म के लिए उसी के औजार को अंगीकार किया। उन्होंने पंडितों की भाषा को अस्वीकार किया, और सामान्य व्यक्ति की भाषा को स्वीकारा। यह क्रान्ति थी महान् युगप्रवर्तक। आम आदमी को अस्वीकृत होते कई सदियाँ बीत चुकी थीं। महावीर और बुद्ध के रूप में दो ऐसी शक्तियों का उदय हुआ, जिन्होंने आम आदमी के चेहरे को पहिचाना, उसकी कठिनाइयों को सहानुभूतिपूर्वक समझा और उसी के माध्यमों का उपयोग करना स्वीकार किया।

धर्म के क्षेत्र में लोक-क्रान्ति

भगवान महावीर ने धर्म के क्षेत्र में जिस लोक क्रान्ति का श्रीगणेश किया, वह अद्वितीय थी। उन्होंने भाषा के माध्यम से वह सब ठुकरा दिया जो विशिष्टों का था। वे मुट्ठी भर लोगों के साथ कभी नहीं रहे, उन्होंने सर्व जनसमुद्र को अपनाया। इसीलिए वे कूद पड़े सब कुछ ठुकरा कर सर्वहारा की कठिनाइयों के समुद्र में। उन्होंने धन को द्वितीय किया, भाषा को द्वितीय किया, सत्ता को द्वितीय किया और आम आदमी को प्रथम किया। भगवान् ने उन सारे सन्दर्भों को द्वितीय कर दिया जो अलगाव का अलख जगा रहे थे; जो उनकी समकालीन चेतना को क्रमहीन और खण्डित कर रहे थे। उन्होंने महल छोड़ा, पाँव-पाँव चले; पात्र छोड़े, पाणिपात्रता को स्वीकार किया; वस्त्र छोड़े, नग्नता को माना-सहा; उस परिग्रह को जो मन के बहुत भीतर गुंजलक मारे बैठा था, ललकारा और घर बाहर किया। भाषा के क्षेत्र में भी उन्होंने वही किया जो जीवन के सारे सन्दर्भों के साथ किया। एक तो वे वर्षों मौन रहे; तब तक, जब तक सब कुछ उन पर खुल नहीं गया; क्योंकि वे साफ-साफ देख रहे थे कि लोग अस्पष्टतायें बाँट रहे हैं। कहीं कुछ भी आलोकित नहीं है, विश्वास तक अन्धा हो गया था। इसलिए उन्होंने साफ-सुथरी परिभाषामुक्त भाषा में लोगों से आमने-सामने बात की और जीवन के सन्दर्भों को, जो जटिल और पेचीदा दिखाई देते थे, खोल कर रख दिया।

भाषा में कितनी अपार ऊर्जा धड़कती है इसे महावीर जानते थे, इसीलिए उन्होंने उस भाषा का उपयोग नहीं किया जो सन्दर्भ खो चुकी थी वरन् उस भाषा को स्वीकार किया, व्यवहार में लिया जो उपस्थित जीवन मूल्यों को समायोजित करने को उदार ऊर्जा रखती थी। अर्धमागधी में वह ऊर्जस्विता थी जिसकी खोज में भगवान थे। जो भाषा एक जगह आकर ठहर गई थी, महावीर ने उसमें बोलने से इनकार कर दिया। उन्होंने उस भाषा का इस्तेमाल किया जो जन-जन को जोड़ती थी, ऊर्जस्विनी थी और शास्त्रीय औपचारिकताओं से परे थी। शास्त्र की पराजय ही महावीर की जय है; भाषा स्थिति नहीं है, गति है। वह रुकती नहीं है, विकास करती है। महावीर ने भाषा की इस शक्ति को, उसके व्यक्तित्व के इस पक्ष को, पलक मारते समझ लिया और तपस्या के उपरान्त जो पाया, उसे उसी के माध्यम से आम आदमी से लेकर विशिष्ट जन तक बड़ी उदारता से बाँट दिया।

संस्कृत और लोक-भाषाओं का द्वन्द्व

महावीर तक आते-आते संस्कृत हथियार बन चुकी थी सांस्कृतिक शोषण-दमन का। वह रूढ़ियों और अन्धी परम्पराओं की शिकार हो चुकी थी। एक तल पर आकर ठहर गई थी। अध्यात्म उसकी इस जड़ स्थिति के कारण संवाद खो चुका था। वह सीमित हो गया था। महावीर ने उसकी इस असमर्थता को समझा और लोक भाषा को अध्यात्म का माध्यम चुना। उन्होंने भाषा की धोखाधड़ियों से लोक जीवन को सुरक्षित किया। सरल अध्यात्म, सरल माध्यम और सम्यक् मार्ग। जीवन के हर क्षेत्र में उन्होंने सम्यक्त्व के लिए समझ पैदा करने का पराक्रम किया। यह पहला मौका था जब उन्होंने जीवन को जीवन की भाषा में उन्मुक्तता से प्रकट होने की क्रान्ति को घटित किया। इसीलिए महावीर की भाषा सुगम थी, सबके लिए खुली थी। उन्होंने ऐसी भाषा के व्यवहार के लिए स्वीकृति दी जो उस समय की वर्तमानता को झेल सकती थी, पचा सकती थी। उन्होंने भाषा के उस स्तर को, जो संस्कृत का पुरोगामी था, अपनी क्रान्ति का माध्यम बनाया।

महावीर की समकालीन चेतना एक तीखे भाषा-द्वन्द्व से गुजर रही थी। संस्कृत और लोक-भाषायें द्वन्द्व में थीं। संस्कृत के पास परम्परा की अन्धी ताकत थी, लोक भाषा के पास ऊर्जा तो थी, किन्तु उसका बोध नहीं था। संस्कृत सीमित होकर प्रभावहीन हो चली थी, लोक भाषायें असीमित होकर प्रभावशालिनी थीं। जो हालत अंग्रेजी के सन्दर्भ में हिन्दी की है प्राकृत और अर्धमागधी की वही स्थिति महावीर के युग में संस्कृत के सन्दर्भ में थी। आम आदमी को अंग्रेजी के लिए दुभाषिया चाहिए। हिन्दी के लिए बीच की कोई औपचारिक कड़ी की आवश्यकता ही नहीं है। वही हाल अर्द्धमागधी या पाली का था; वहाँ किसी बिचौलिये की जरूरत नहीं थी। सीधा संपर्क था। महावीर ने बिचौलिया-संस्कृति को भाषा के माध्यम से समाप्त किया। उन्होंने उस माध्यम का उपयोग ही नहीं किया जिसे बिचौलिये काम में ले रहे थे। यह क्रान्ति थी, जिसकी आम आदमी प्रतीक्षा कर रहा था। भाषा की पारिभाषिकता अचानक बिखर गई और चारों ओर चिन्तन के खुले मैदान दिखाई देने लगे। यह था महावीर का व्यक्तित्व जो बुद्ध में होकर कबीर और गाँधी तक निरन्तर चला आया है।

दिव्यध्वनि: सबके पल्ले पड़ने वाली भाषा

महावीर की सर्वोपरि शक्ति भाषा थी। अर्द्धमागधी या लोकभाषा निर्बल की बल राम थी। महावीर की भाषा को 'दिव्यध्वनि' कहा गया। यह कोई रहस्यवादी शब्द नहीं है। दिव्यध्वनि वह जो सबके पल्ले पड़े; और अदिव्य वह जो कुछेक की हो और शेष जिससे वंचित रह जाते हों। महावीर की दिव्यध्वनि अपने युग के प्रति पूरी तरह ईमानदार है, वह सुबोध है, और अपने युग के तमाम सन्दर्भों से जुड़ी हुई है। महावीर के दो उपदेश माध्यम हैं: उनका जीवन और उनके समवशरण। समवशरण में बोलचाल की भाषा का तल तो है ही, वहाँ जीवन का भी एक तल पूरी आभा और तेजस् में प्रकट है। पशुजगत् भी वहाँ है और महावीर को समझ रहा है। महावीर भाषा में हैं, भाषातीत हैं। उन्हें समझ में आ रहे हैं जो भाषा को नहीं जानते; और उन्हें भी समझ में आ रहे हैं जो भाषा के भीतर चल रहे हैं। उनका जीवन स्वयं माध्यम है। उनकी करुणा और वीतरागता स्वयं भाषा है। आज मन्दिर भले ही पाखण्ड और गुरुडम के अड्डे हों किन्तु मूर्तियों के पीछे वही दिव्यध्वनि काम कर रही है, जो समवशरण में सक्रिय थी। मूर्ति के लिए कौनसी भाषा चाहिए भला? उसकी करुणा और वीतरागता को न संस्कृत चाहिए, न अर्द्धमागधी, न प्राकृत, न अपभ्रंश, न हिन्दी और न अंग्रेजी। इसलिए महावीर की भाषाक्रान्ति इतनी शक्तिशाली साबित हुई कि उसने भाषा की सारी धोखाधड़ियाँ समाप्त कर दीं और धर्म की ठेकेदारी बन्द कर दी। भाषा के सन्दर्भ में आज फिर महावीर को घटित करने की जरूरत है। जैनों को अपने सारे शास्त्र अर्द्धमागधी, प्राकृत और अपभ्रंश के बन्धक से मुक्त कर लेने चाहिए। कोई उद्धरण नहीं, कोई परिभाषा नहीं; सीधे-सीधी बात, आमने-सामने दो टूक बात। जैनाचार्यों ने ऐसा ही किया है अपने-अपने युगों में।

भाषा-क्रान्ति: ज्ञान, समझ और आधुनिकता

भगवान महावीर की भाषा-क्रान्ति को समझने के लिए दो शब्दों को समझने की जरूरत है: 'ज्ञान' और 'समझ'। जानना 'समझना' नहीं है; 'नोइंग इज नाट अंडरस्टेंडिंग।' ज्ञान और सम्यग्ज्ञान में 'नोइंग' और 'अंडरस्टेंडिंग' का फर्क है। ज्ञान में हम जानते हैं, समझते नहीं हैं। सम्यक् ज्ञान में हम जानते भी हैं और समझते भी हैं। समझना कई बार भाषा की अनुपस्थिति में भी घटित होता है। वह गहरी चीज है। मर्म की पकड़ उसके संपूर्ण आयामों में 'समझ' है, शब्द की या परिस्थिति की पकड़ केवल एक ही आयाम में ज्ञान है। महावीर ने अंडरस्टेंडिंग की ओर ध्यान दिया। और यह परम्परित भाषा या शास्त्र से सम्भव नहीं था, इसके लिये साफ-सुथरा जीवनतल चाहिये था। महावीर की भाषा-क्रान्ति की सबसे बड़ी विशिष्टता यही है कि उसने लोक जीवन की समझ को पुनरुज्जीवित किया। शास्त्र को खारिज किया और सम्यग्ज्ञान को प्रचलित किया। आज के अभिशप्त आम आदमी को भी महावीर में एक सहज स्थिति का अनुभव हो सकता है।

महावीर की भाषा-क्रान्ति की एक और खूबी यह थी कि वह आधुनिकता को झेल सकती थी। महावीर तब तक मौन रहे जब तक उन्हें इन्द्रभूति गौतम जैसा अत्याधुनिक नहीं मिल गया। गौतम सब जानता था, उसे परम्परा का बोध था, युगबोध था; किन्तु सब खण्डित, असमग्र, क्रमहीन; महावीर के संसर्ग ने उसमें एक क्रम पैदा कर दिया। वह उस समय की सड़ी-गली, जर्जरित व्यवस्था का ही अंग था किन्तु उसमें सामर्थ्य थी जूझने की। वह आधुनिक था भगवान महावीर के युग में। भगवान इस तथ्य को जानते थे। उन्होंने अपने ज्ञान का खजाना इन्द्रभूति पर उन्मुक्त कर दिया। भाषा की जिस क्रान्ति को महावीर ने घटित किया इन्द्रभूति में वह स्थिति उपस्थित है। महावीर से वह छिपी नहीं है। इस तरह महावीर ने अपनी समकालीन आधुनिकता को भाषा के माध्यम से संबंधित किया और अध्यात्म को जर्जरित होने से बचाया। महावीर को भाषा के क्षेत्र में पुनः पुनः घटित करने की आवश्यकता से हम इनकार नहीं कर सकेंगे।

स्रोत

यह लेख शोध-पत्रिका ‘अनेकान्त’ के वर्ष 27, अंक 3 (November 1974) में प्रकाशित हुआ था। मूल मुद्रित पृष्ठ सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट के डिजिटल संग्रह ‘पत्रिका’ में सुरक्षित हैं — पत्रिका पर मूल लेख देखें।

प्रस्तुति: पुराने मुद्रित पाठको डिजिटल रूपमें लाते समय केवल छपाई और स्कैनकी त्रुटियाँ सुधारी गई हैं; लेखकके शब्द और उस समयकी वर्तनी यथावत् रखी गई है। उपशीर्षक पाठकोंकी सुविधाके लिए जोड़े गए हैं।