Research Articles
संस्कृत से अरुचि क्यों
संस्कृत भाषा के वाङ्मय की विविधता और महत्ता के बावजूद समाज में उसके प्रति अरुचि उत्तरोत्तर बढ़ रही है। लेखक इसके अनेक कारणों का विश्लेषण कर इसे भारतीय संस्कृति के जीवन-मरण का प्रश्न बताते हैं।
संस्कृत भाषा के वाङ्मय की विविधता और महत्ता के बावजूद समाज में उसके प्रति अरुचि उत्तरोत्तर बढ़ रही है। लेखक इसके अनेक कारणों का विश्लेषण कर इसे भारतीय संस्कृति के जीवन-मरण का प्रश्न बताते हैं।
सूरसागर और बनारसीदास, द्यानतराय, भूधरदास आदि जैन कवियों के हिन्दी पद-काव्य की तुलना — वात्सल्य, विवाह, विरह, सखाभाव और चित्रमयता के आधार पर दोनों की समानताएँ और भिन्नताएँ।
स्याद्वाद अपेक्षा का सिद्धान्त है। पं० चैनसुखदास न्यायतीर्थ बताते हैं कि इसे केवल शास्त्रों की चीज बना दिया गया, जबकि यह जीवन-व्यवहार का सिद्धान्त है—झगड़ों के शमन और अहिंसा के लिए उपयोगी।