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Research Articles

संस्कृत के जैन सन्देश काव्य

मेघदूत से चली सन्देश काव्य परम्परा को जैन कवियों ने अपनाकर प्रेम-सन्देश के स्थान पर आध्यात्मिक सन्देश और मोक्ष की प्रेरणा दी। 'संस्कृत के जैन सन्देश काव्य' शोध-प्रबन्ध के आठ अध्यायों का परिचय।

‘संस्कृत के जैन सन्देश काव्य’ — अनेकान्त (1990) से कल्पना देवी जैन का लेख
Samyakgyan Prachar-Prasar Trust
In this article
  1. जैन कवियों द्वारा सन्देश काव्य परम्परा का अनुसरण
  2. शोध-प्रबन्ध के आठ अध्याय
  3. शोध-प्रबन्ध का सार
  4. स्रोत

संस्कृत-साहित्य में कतिपय परम्पराओं का पल्लवन होता रहा है। इनमें सन्देश काव्य परम्परा भी एक है। कवियों द्वारा किसी को दूत बनाकर विरहणियों के सन्देश को प्रेषित किया गया है। आदि कवि बाल्मीकि ने पवनसुत हनुमान को राम का दूत बनाकर सीता के पास भेजा था। कदाचिद्‌ इसी से कल्पना ग्रहण कर कालिदास ने मेघ को दूत बनाकर किसी यक्ष के द्वारा यक्षिणी के पास सन्देश भिजवाया। यही सन्देश काव्य “मेघदूत” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बस क्या था इसी को आधार बनाकर दूत काव्य अथवा सन्देश काव्य परम्परा चल पड़ी। इस परम्परा का अनुसरण धोयी पवनदूत आदि काव्यों द्वारा किया गया।

जैन कवियों द्वारा सन्देश काव्य परम्परा का अनुसरण

इस सन्देश काव्य परम्परा को जैन कवियों ने भी अपनाया। जम्बू कवि का चन्द्रदूत पवनदूत से भी प्राचीन काव्य है। अन्य जैन कवियों ने सन्देश काव्य परम्परा का अनुसरण करते हुए अनेक सन्देश काव्य लिखे। सन्देश काव्यों की एक दिशा नवीन भावों तथा विषयों के वर्णन की ओर प्रवाहित हुई। जैन कवियों ने अपने दर्शन के गूढ़ सिद्धान्तों की अभिव्यन्जना के लिए सन्देश काव्य का आश्रय लिया। प्रेम सन्देश के स्थान पर इन नवीन काव्यों में आध्यात्मिक उन्नति के विषय में सन्देश प्रेरित किया गया है। इन सन्देश काव्यों में जैन दर्शन के आध्यात्मिक तत्व का निरूपण काव्य की सरल भाषा में हुआ है। इनमें सांसारिकता का पुट बहुत कम मिलता है। सांसारिक विषय रागों का वर्णन केवल मात्र आध्यात्मिक तत्व की महत्ता को दर्शाने हेतु ही किया गया है। प्रस्तुत शोधप्रबन्ध “संस्कृत के जैन सन्देश काव्य” भी सन्देश काव्य परम्परा में लिखे गये जैन सन्देश काव्यों के सौन्दर्य विश्लेषण करने हेतु लिया गया है।

शोध-प्रबन्ध के आठ अध्याय

प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध आठ अध्यायों में विभक्त किया गया है।

प्रथम अध्याय: सन्देश काव्यों का सामान्य परिचय

प्रथम अध्याय के अन्तर्गत सन्देश काव्यों का सामान्य परिचय देते हुए सन्देश काव्य-परम्परा पर प्रकाश डाला गया है। कालिदास द्वारा रचित “मेघदूत” संस्कृत साहित्य की वह अनुपम कृति है जिसके द्वारा सन्देश काव्य परम्परा को सुदृढ़ता प्राप्त हुई है। इसी अनुपम कृति को अपना प्रेरणा स्रोत मानकर जैन कवियों ने जैन सन्देश काव्यों की रचना की। इन काव्यों में सन्देश काव्य-परम्परा को एक नया मोड़ दिया गया है। मेघदूत का अनुसरण शील होने पर भी ये काव्य सांसारिकता एवं मोह-माया को किंचित्‌मात्र स्थान नहीं देते। तप के द्वारा प्राप्त चरम सत्य को इन काव्यों में विशेष स्थान प्राप्त है। इन्हीं विशेषताओं का उल्लेख प्रथम अध्याय में किया गया है। मोक्ष प्राप्ति की प्रेरणा एवं श्रमण संस्कृति का निर्वाह इन काव्यों की मुख्य विशेषताओं में आते हैं। इस प्रकार प्रथम अध्याय के अन्तर्गत सन्देश काव्यों का सामान्य परिचय, जैन सन्देश काव्यों का मूल स्रोत एवं विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए प्रस्तुत अध्ययन के विषय क्षेत्र को बताया गया है।

द्वितीय अध्याय: ग्रन्थों का परिचय, कथा और सन्देश

द्वितीय अध्याय में जैन सन्देश काव्यों के ग्रन्थों का परिचय एवं संक्षिप्त कथा को प्रस्तुत किया गया है। इन जैन सन्देश काव्यों की कथावस्तु एक ही तत्व पर जोर डालती है और वह है मोक्ष। इन काव्यों का नायक प्रारम्भ में तो सांसारिक सुखों का उपभोग करता है परन्तु किसी कारण वश उसे सांसारिक मोह-माया से विरक्ति हो जाती और वह संसार के भोग विलासों से विरक्त होकर तप में लीन हो मोक्ष प्राप्ति करता है। जैन सन्देश काव्यों का पहला उद्देश्य है जीवन के चरम सत्य मोक्ष से परिचित कराना। समस्त सांसारिक मोह विलास क्षण विध्वंसी है। सच्चा सुख इन सांसारिक बन्धनों का त्याग एवं मोक्ष प्राप्ति में है। इसी आध्यात्मिक तथ्य को पाठक जनों समक्ष प्रस्तुत करते हुए इन काव्यों में श्रमण संस्कृति का निर्वाह किया गया है। श्रमण संस्कृति से परिचित कराना इन जैन सन्देश काव्यों का दूसरा उद्देश्य है। मेघदूत के सदृश ही इन काव्यों में भी सन्देश प्रेषित किया गया है। परन्तु इनके सन्देशों में विरहावस्था एवं वियोग शृंगार के साथ-साथ आध्यात्मिकता को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। नायक-नायिका को आध्यात्मिक उन्नति का सन्देश देते हुए सांसारिक चीजों के प्रति मोह को दूर करता है। अतः इस अध्याय में जैन सन्देश काव्यों के सन्देशों का विवेचन करते हुए वर्णित सन्देशों के स्वरूप को बताया गया है। विशेषतः इन काव्यों में वर्णित सन्देशों में आध्यात्मिकता का पुट मिलता है। नायिका के विरह सन्देश को भी कवि ने आध्यात्मिक सन्देश की महत्ता को दर्शाने हेतु ही प्रस्तुत किया है। प्रकृति का अतीव सजीव चित्रण यहां उपलब्ध है। इसी अध्याय के अन्तर्गत जैन सन्देश काव्यों में प्रयुक्त सूक्ति पदों को भी दर्शाया गया है। इस प्रकार द्वितीय अध्याय में जैन सन्देश काव्य परम्परा का निर्वाह करते हुए जैन सन्देश काव्यों के ग्रन्थों का परिचय, संक्षिप्त कथा, उद्देश्य, सुभाषित, सन्देश एवम्‌ प्रकृति चित्रण को प्रस्तुत किया गया है।

तृतीय अध्याय: काव्यगत विशेषताएँ

तृतीय अध्याय में जैन सन्देश काव्यों की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख किया है। इस अध्याय में सत्य, क्षमा, त्यागादि आध्यात्मिक मूल्यों का विश्लेषण कर काव्यों की पृथकता एवं मौलिकता को दर्शाया गया है। मोह विलासों से दूर इन काव्यों का नायक सत्यादि मूल्यों का पालन करते हुए अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त करता है।

सत्य के स्वरूप को जैन कवियों ने सच बोलने की अपेक्षा जीवन के वास्तविक सत्य मोक्ष के रूप में प्रतिपादित किया है। नायक सत्यवादी तो है ही साथ ही साथ जीवन के चरम सत्य को भी भली भाँति जानता है। सत्य के समान ही क्षमा, दया, अहिंसा आदि तत्वों को भी विशेष स्थान प्राप्त है। इसके अतिरिक्त परमार्थ को इन काव्यों में विशेष महत्व दिया गया है। सत्यादि तत्वों का स्पष्ट रूप नायक के व्यक्तित्व में स्पष्ट झलकता है। अमूर्त विषयों को मूर्त रूप में दर्शाना इन काव्यों के कवियों की बुद्धि चातुर्य का प्रतीक है। शीलदूत काव्य में शील जैसे अमूर्त विषय से प्रभावित होकर नायिका समस्त मोह विलासों का परित्याग कर तप मार्ग का अनुसरण करने लगती है। क्षमावान होने के कारण नायक अपने मार्ग में आई हर बाधा को दूर कर देता है तथा अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर लेता है। परमार्थ तत्व का विश्लेषण करते हुए बताया गया है कि जीवन का चरम लक्ष्य मोक्ष है। केवल यही एक सत्य है। शेष सभी सांसारिक सुख असत्य हैं। प्रकृति चित्रण के अन्तर्गत इस अध्याय में प्रकृति को विभिन्न रूपों में प्रदर्शित किया गया है। आलम्बन, उद्दीपन, मानवीकरण, संश्लिष्ट, उपदेश एवं नामपरिगणन आदि सभी रूपों में जैन कवियों ने प्रकृति का चित्रण किया है।

चतुर्थ अध्याय: शैलीगत विशेषताएँ

चतुर्थ अध्याय में जैन सन्देश काव्यों की शैलीगत विशेषताओं का अध्ययन किया गया है। अन्तरंग एवं बहिरंग दोनों ही दृष्टि से विभाजित कर काव्यतत्वों का विश्लेषण किया गया है। अन्तरंग तत्वों के विश्लेषण में रस, ध्वनि एवं गुणीभूत व्यंग्य का विवेचन है। करुण एवं शांत रस दोनों का वर्णन इन काव्यों में किया गया है। गुणीभूत व्यंग्य के अन्तर्गत अगूढ़ व्यंग्य, सन्दिग्ध प्राधान्य व्यंग्य, असुन्दर व्यंग्य एवं अस्फुट व्यंग्य का विवेचन किया गया है। ध्वनि का भी इस अध्याय में पूर्ण रूपेण विवेचन किया गया है। श्लेष, उपमा, उत्प्रेक्षा, यमक आदि अलङ्कारों की सुन्दर योजना की गई है। माधुर्य, ओज एवं प्रसाद आदि गुणों को भी इस अध्याय में स्पष्ट किया गया है। रूढ़ि, योग, योग रूढ़ि, लक्षणा, लक्षण, लक्षणा, रूढ़ि लक्षणा एवं व्यन्जना शक्ति आदि को भी स्पष्ट किया गया है। मन्दाक्रान्ता छन्द में निबद्ध कुछ श्लोकों के उदाहरण को इस अध्याय में प्रस्तुत किया गया है।

पंचम अध्याय: पात्रों का चरित्र-चित्रण

पंचम अध्याय में पात्रों का चरित्र-चित्रण प्रस्तुत है। चरित्र-चित्रण की दृष्टि से ये जैन सन्देश काव्य अपना पृथक महत्व रखते हैं। पार्श्वनाथ जैसे महान चित्रण को चित्रित किया गया है। इसके अतिरिक्त शम्बर, नेमिकुमार, राजुलमति, स्थूलभद्र, कोशा, विजयगणि एवं वसुन्धरा के चरित्र को भी चित्रित किया गया है। पार्श्वनाथ, नेमिकुमार एवं स्थूलभद्र का चरित्र एक महान ऋषि के रूप में चित्रित है। क्षमा, त्याग, अहिंसा, धैर्य आदि इनके व्यक्तित्व की मुख्य विशेषताएँ हैं। ये दार्शनिक चिन्तन में लीन दिखलाई पड़ते हैं। तपस्वी के रूप में चित्रित इनका चित्रण एक ऐसे महान्‌ चित्रण के रूप में चित्रित है जो तप एवं योग साधना में रत उस आध्यात्मिक तत्व की प्राप्ति का इच्छुक है जिसे मोक्ष कहते हैं। काव्यान्त में मोक्ष प्राप्त कर नायिका को भी दीक्षा दान देते हैं। राजुलमति, कोशा एवं वसुन्धरा को एक विरहणी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन तीनों पात्रों का चित्रण पूर्णतः सांसारिक है। संसार के भोग विलासों में लिप्त ये प्रिय वियोग से पीड़ित हैं। सांसारिक भोग विलासों में लिप्त होने पर भी ये पतिव्रता एवं आदर्श नारी के रूप में काव्य में प्रतिष्ठित हैं। अपने आदर्शों एवं कर्त्तव्यों को ये भली-भांति जानती हैं। विजयगणि का चरित्र पार्श्वनाथ आदि के चरित्र से बिल्कुल विपरीत है। वह न तो तप में लीन है और न ही अलौकिक सौन्दर्य (मोक्ष) की प्राप्ति का इच्छुक है। विजयगणि का चरित्र सांसारिक भावनाओं से भी लिप्त है यही कारण है कि वह अपनी प्रिया के वियोग की पीड़ा से पीड़ित रहता है तथा उससे मिलन की आकांक्षा रखता है। इन सब विभिन्नताओं के होने पर भी अन्य पात्रों से एक समानता हमें इस चित्रण में मिलती है और वह है क्षमावान होना। वह अत्यन्त धैर्यशाली एवं क्षमावान प्रकृति का है। इस प्रकार इस अध्याय में पात्रों के चरित्र चित्रण को प्रस्तुत किया गया है।

षष्ठ अध्याय: शान्त रस और समस्यापूर्ति विधा

षष्ठ अध्याय में शान्त रस की अभिव्यंजना एवं समस्यापूर्ति विधा के विकास को प्रस्तुत किया गया है। मेघदूत इन काव्यों का प्रेरणा स्रोत रहा है और मेघदूत में पूर्णतः शृंगार रस का राज्य दिखाई पड़ता है किन्तु जैन कवियों ने अपने जैन सन्देश काव्यों में शृंगार रस के साथ-साथ शान्त रस की भी अभिव्यंजना की है। काव्यों का प्रारम्भ तो शृंगार रस से होता है परन्तु अन्त शान्त रस में। इस प्रकार शृंगार रस को जैन सन्देश काव्यों में शान्त रस में परिवर्तित कर दिया गया है। विरह दग्ध नायिका की उत्तेजित भावनाओं को नायक अत्यन्त सरलता एवं सौम्यता के साथ शान्त करता है तथा संसार के प्रति उसके क्षणिक भ्रम को दूर कर देता है। इन काव्यों का उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति है जो तप एवं साधना के द्वारा प्राप्त किया जाता है। मोक्ष प्राप्ति शान्ति एवं धैर्य के द्वारा प्राप्त होती है। इसी कारण जैन सन्देश काव्यों में शृंगार रस की अपेक्षा शान्त रस का आधिपत्य है। शान्त रस के साथ-साथ इस अध्याय में समस्यापूर्ति विधा के विकास पर भी प्रकाश डाला गया है। समस्यापूर्ति विधा यूँ तो प्राचीन काल से ही चली आ रही है परन्तु विकसित रूप से इसे बाद ही में मिला। प्राचीन काल में मौखिक रूप से इस विधा का प्रयोग किया जाता था परन्तु बाद में काव्य निर्माण में इस विधा का प्रयोग किया जाने लगा। मेघदूत के अन्तिम चरणों को लेकर जैन कवियों ने समस्यापूर्ति रूप में जैन सन्देश काव्यों की रचना की। इन काव्यों की यह विशेषता है कि उन्होंने मेघदूत को अपना आधार मानकर उसके श्लोकों के अन्तिम चरणों की समस्यापूर्ति की है। मेघदूत के श्लोकों में पूर्णतः सांसारिक मोह विलासों के दर्शन होते हैं। इन सांसारिक भावनाओं को स्पष्ट करने वाली पंक्तियों को जैन कवियों ने अपने विचारों एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है जो कि अपने आप में चातुर्य एवं अलौकिक प्रतिभा का द्योतक है। शृंगारिक पंक्तियों को बड़े ही सुन्दर ढंग से अध्यात्मिकता की ओर मोड़कर इन कवियों ने श्रमण संस्कृति का भी पूर्णरूपेण निर्वाह किया है। समस्यापूर्ति विधा में दूसरे के द्वारा निर्मित पंक्तियों को अपने विचारों में परिवर्तित करने की कुशलता का ही परिचय दिया जाता है और ये कुशलता इन जैन सन्देश काव्यों में स्पष्टरूप से दृष्टिगोचर है। मेघदूत और जैन सन्देश काव्यों का उद्देश्य पृथक्‌-पृथक्‌ है फिर भी जैन कवियों ने मेघदूत की शृंगारिक पंक्तियों की समस्या पूर्ति करते हुए अपने विचारों में परिवर्तित कर अपने उद्देश्यों की पूर्ति की है।

सप्तम अध्याय: श्रमण संस्कृति एवं जैन आचार धर्म दर्शन

सप्तम अध्याय में जैन सन्देश काव्यों में वर्णित श्रमण संस्कृति को वर्णित किया गया है। इस अध्याय को श्रमण संस्कृति एवं जैन आचार धर्म दर्शन दो भागों में विभक्त किया गया है। श्रमण संस्कृति की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कर प्रस्तुत जैन सन्देश काव्यों में इन विशेषताओं को वर्णित किया गया है। जैन सन्देश काव्यों में श्रमण संस्कृति के सभी नियमों एवं मान्यताओं को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। जैन कवियों ने अपने काव्यों में शाप एवं दण्ड जैसी किसी प्रथा को वर्णित नहीं किया है। ईश्वर जैसी किसी परोक्ष शक्ति का इन काव्यों में वर्णन नहीं मिलता। तप, वैराग्य एवं संयम को इन काव्यों के नायक ने अपने जीवन में सर्वाधिक महत्व दिया है। संस्कृत के जैन सन्देश काव्यों में चरित्र का विकास अनेक जन्मों के बीच हुआ है जो कि श्रमण संस्कृति की एक विशेषता है। इसी अध्याय के अन्तर्गत जैनाचार धर्म दर्शन के विभिन्न सिद्धांतों एवं नियमों को प्रस्तुत किया है। आत्मा की सत्ता को सिद्ध करते हुए भौतिक स्वरूप के भ्रम को स्पष्ट करने हेतु त्याग, तप, योग आदि को विशेष रूप से वर्णित कर जैन धर्म दर्शन का उल्लेख किया गया है। जैन दर्शन के सभी तत्त्व-जीव, अजीव आदि का स्वरूप इस अध्याय में दर्शित है। इसके अतिरिक्त जैनाचार के अन्तर्गत श्रावकाचार एवं मुनि-आचार सम्बन्धी सभी नियमों का उल्लेख इस अध्याय में वर्णित है।

अष्टम अध्याय: उपसंहार

अष्टम अध्याय में उपसंहार के अन्तर्गत प्रस्तुत अध्ययन का निष्कर्ष, महत्व एवं योगदान को स्पष्ट किया गया है। आत्मा के स्वरूप को स्पष्ट कर मोक्ष प्राप्ति की ओर प्रेरित करने के कारण इन जैन सन्देश काव्यों का संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में विशेष योगदान रहा है।

शोध-प्रबन्ध का सार

प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध के सार रूप में हम यह कह सकते हैं कि जैन सन्देश काव्य अपने आप में पृथक्‌ एवं मौलिक विशेषताओं को लेकर चलते हैं। इन काव्यों में विशेषतः मोक्ष एवं श्रमण संस्कृति को वर्णित किया है। इन काव्यों के प्रारम्भ में शृंगार रस को प्रतिपादित किया गया है। परन्तु काव्यान्त तक आते-आते शृंगार रस शान्त रस में परिवर्तित हो जाता है। काव्यारम्भ में तो सहृदय जन काव्यानन्द की प्राप्ति करते हैं परन्तु काव्य के उत्तरार्ध में आध्यात्मिक एवं सदाचार तत्वों को ही स्पष्ट किया गया है। इन सन्देश काव्यों की रचना मन्दाक्रान्ता छंद में हुई है। उपमा, यमक, उत्प्रेक्षा, श्लेष आदि अलंकारों की सुन्दर योजना की गई है। इन काव्यों में वैदर्भी शैली का प्रयोग किया गया है। भाषा प्रसाद गुण, सरस एवं सरल है तथा सर्वत्र प्रवाह दृष्टिगोचर होता है। पदलालित्य की दृष्टि से यत्र-तत्र सुन्दर सुभाषितों का प्रयोग किया गया है। अतः संस्कृत के जैन सन्देश काव्य भाषाशैली, अलंकार, रस, भाव विश्लेषण एवं पदलालित्य की दृष्टि से पृथक्‌ एवं मौलिक स्थान रखते हैं।

स्रोत

यह लेख शोध-पत्रिका ‘अनेकान्त’ के वर्ष 43, अंक 3 (July-September 1990) में प्रकाशित हुआ था। मूल मुद्रित पृष्ठ सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट के डिजिटल संग्रह ‘पत्रिका’ में सुरक्षित हैं — पत्रिका पर मूल लेख देखें।

प्रस्तुति: पुराने मुद्रित पाठको डिजिटल रूपमें लाते समय केवल छपाई और स्कैनकी त्रुटियाँ सुधारी गई हैं; लेखकके शब्द और उस समयकी वर्तनी यथावत् रखी गई है। उपशीर्षक पाठकोंकी सुविधाके लिए जोड़े गए हैं।