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अहिंसा की व्यावहारिकता

मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अहिंसा का महत्त्व है। योगशास्त्र, समन्तभद्र, कुन्दकुन्द और अमृतचन्द्र के प्रमाणों से लेख बताता है कि मद्य, मांस, मधु और हिंसक व्यापार का त्याग तथा प्रमाद-रहित, सावधान आचरण ही अहिंसा की व्यावहारिकता है।

‘अहिंसा की व्यावहारिकता’ — अनेकान्त (2002) से श्रेयांसकुमार जैन का लेख
Samyakgyan Prachar-Prasar Trust
In this article
  1. अहिंसा धर्म का लक्षण
  2. सर्वोदयी अहिंसा
  3. सभी जीव जीना चाहते हैं
  4. हिंसा और प्रमाद
  5. गृहस्थ की अहिंसा
  6. जीवन में अहिंसा की व्यावहारिकता
  7. स्रोत

मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अहिंसा का महत्त्व है। चाहे वह वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक हो, सभी में अहिंसा की विशेषता रहती है और बार-बार इसके प्रयोग के अवसर उपस्थित होते हैं। यथा गंगा नदी की प्रत्येक लहर में जल व्याप्त है, उसी प्रकार मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अहिंसा व्याप्त होती है। इसके बिना मानव का एक दिन भी कार्य नहीं चल सकता है और न चला है। जहाँ भी कोई पारिवारिक समस्या उपस्थित हुई, सामाजिक आपत्तियाँ आना शुरू हुईं, धार्मिक विवाद खड़े हुए, आर्थिक उलझन आ पड़ी, राजनैतिक संघर्ष की आहट हुई- सभी के समाधान के लिए मनुष्य को अहिंसा की ही शरण लेनी पड़ती है। क्योंकि अहिंसा ही सर्वश्रेष्ठ है, वही जीवन का सर्वस्व है। इसीलिए अहिंसा का गुणगान करते हुए कहा है-

मातेव सर्वभूतानामहिंसा हितकारिणी, अहिंसैव हि संसारमरावमृतसारणिः। अहिंसा दुःखदावाग्निप्रावृट्पयोदावली, भवभ्रमिरुगार्तानामहिंसा परमौषधिः॥ -योगशास्त्र, प्रकाश 2, श्लोक 50-59

अहिंसा माता के समान सभी प्राणियों का हित करने वाली है। अहिंसा संसाररूपी मरुस्थली में अमृत की नदी है। अहिंसा दुःखरूपी दावानल को विनष्ट करने के लिए वर्षाकालीन मेघों की घनघोर घटा है। अहिंसा भवभ्रमणरूपी रोग से पीड़ित जनों के लिए उत्तम औषध है। “अत्ता चेव अहिंसा” अर्थात् आत्मा ही अहिंसा है।

आचार्य श्री समन्तभद्र ने कहा है कि “अहिंसा सम्पूर्ण जगत् में सद्भावना, सहृदयता, सहानुभूति, जनसेवा और दया का संदेश देकर प्राणिमात्र के लिए प्रकट रूप में परमब्रह्म है।” वैदिक परम्परा में इसे परमधर्म कहा है। यह धर्म का प्राण है, इसके बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता है। सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह आदि सभी व्रतों का समावेश अहिंसा में हो जाता है। श्रमणसंस्कृति का मूल स्वरूप अहिंसा है। इसके बिना न नैतिकता जीवित रह सकती है और न ही आध्यात्मिकता। अहिंसा की व्यावहारिकता सिद्ध है, क्योंकि चाहे गृहस्थ हो या साधु, सर्वप्रथम अहिंसा की प्रतिज्ञा लेता है। इसकी प्रतिज्ञापूर्वक ही जीवन विकासपथ पर बढ़ पाता है। सामाजिक जीवन का प्रथम कर्तव्य अहिंसा है, मानव सभ्यता का आदर्श है। आत्मसिद्धि के लिये अनुकूल क्रिया-कर्म, जप-तप, अनुष्ठान, त्याग व्रतादि सभी अहिंसा हैं।

अहिंसा सभी सुखों का स्रोत रही है, इसकी आराधना से मानव ने लौकिक और पारलौकिक सभी प्रकार की सुख-शान्ति प्राप्त की है। आज भी अहिंसा में वही शक्ति है। मानव के जीवन में क्लेशों और कष्टों का अन्त करने में अहिंसा आज भी उतनी ही सक्षम है, जितनी पूर्वकाल में थी। यह तभी संभव है, जब अहिंसा का पूर्ण आदर किया जाय, उसे जीवन में उतारा जाय। मानव को मांस, मदिरा, मधु का सर्वथा त्याग करना ही होगा। हिंसाजन्य व्यापार का त्याग करना ही चाहिए। ऐसे किसी भी कार्य को जानबूझकर नहीं करना चाहिए, जिसमें किसी प्राणी का प्राण हरण किया जाय।

अहिंसा धर्म का लक्षण

अहिंसा को तत्त्वचिन्तकों ने चेतना-विकास के लिए अपरिहार्य माना है, उन्होंने इसे धर्म का स्वरूप व्याख्यायित किया है-

अहिंसा लक्षणो धर्मः अधर्मः प्राणिनां वधः। तस्माद् धर्मार्थिभिर्लोके कर्तव्या प्राणिनां दया॥

अहिंसा धर्म का लक्षण, स्वरूप, आधार या मूलकेन्द्र जो कुछ भी कहें, वह सब है। अहिंसा जीवन का प्रकाश है। अहिंसक को भय नहीं होता, उसका धैर्य अभेद्य किले के समान रक्षा करता है। सत्य प्रतिपादन में वह निर्भय रहता है, कोई प्रतिवादी उसे परास्त नहीं कर सकता, संसार-प्रपञ्चों में नहीं फंसता है, सर्वप्रिय हो जाता है, संसार का मित्र बन जाता है। सम्यक्त्व के अंग वात्सल्य, उपगूहन, स्थितिकरण और श्रावक के व्रत उसके जीवन के अंग हो जाते हैं। अहिंसक वृत्ति वाले की धर्म और धर्मात्माओं के प्रति प्रीति-वात्सल्य, विनय जाग्रत रहता है, सतत सावधान रहता है।

जिसके चित्त में हिंसा के विचार नहीं है, उसे शेर या सांप आदि कोई भी हानि नहीं पहुँचाता है; जिसके हिंसक भाव होते हैं, उन्हीं के ऊपर सिंहादि क्रूर प्राणी भी हमला करते हैं।

अहिंसक वृत्ति वाले व्यक्तियों के समक्ष हिंसक से हिंसक प्राणियों में परिवर्तन देखा जाता है। भगवान महावीर जब मुनि अवस्था में ऋजुकूला नदी के तट पर साधना में लीन थे, तभी एक सिंह चमरी गाय का पीछा करता हुआ उधर पहुँचा। गाय प्राण-रक्षा हेतु दौड़ रही थी कि उसके पूंछ के बाल झाड़ी में उलझ गये। बालों के उलझने से वह खड़ी हो गयी, क्योंकि चमरी गाय को अपने बाल प्राणों से भी अधिक प्रिय होते हैं। सिंह ज्यों गाय के पास पहुँचता है तो उसकी दृष्टि साधना में लीन महावीर पर पड़ती है, उन्हें देखते ही उस हिंसक वृत्ति वाले सिंह की वृत्ति बदल गयी और अपने पंजे से चमरी गाय के पूंछ के बालों को सुलझा देता है। यह है अहिंसक की भावनाओं का प्रभाव।

इसी प्रकार का प्रसंग जयपुर के दीवान अमरचन्द का है, वह व्रती थे, उन्होंने मांस खिलाने का त्याग किया हुआ था। जब चिड़ियाघर के शेर को मांस खिलाने के कागजात उनके पास आये तो उन कागजों पर आज्ञा नहीं दी। कर्मचारियों ने जब कहा कि शेर का आहार ही मांस है, वह अन्य कुछ नहीं खाता, तब दीवान जी ने कहा- मैं खिलाऊंगा, और अगले दिन वह दूध-जलेबी लेकर निःसंकोच शेर के पिंजड़े में घुस गये। शेर के सामने दूध-जलेबी रखकर बोले कि यदि भूखे हो तो दूध-जलेबी खा लो, हाँ, यदि मांस ही खाना है, तो मैं खड़ा हूँ सामने, मुझे खा लो।

उक्त प्रसंगों से स्पष्ट है कि अहिंसक भाव या विचारवालों का दूसरों पर कितना प्रभाव पड़ता है।

सर्वोदयी अहिंसा

अहिंसा का सिद्धान्त सर्वोदयी है। सर्वोदय तीर्थ में अहिंसा का सर्वोच्च स्थान है, इसमें मानसिक, वाचिक, कायिक अहिंसाओं का महत्त्व प्रतिपादित है। जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूप अभ्युदय के कारणों की उत्पत्ति-वृद्धि में कारण होता है, वह सर्वोदय तीर्थ है।

संसार में जितने भी धर्म, पंथ, सम्प्रदाय या मत हैं, वे सच्चे अर्थ में धर्म हैं या नहीं, उनमें धर्म का अस्तित्व है भी या नहीं? उनमें धर्म का आधार है या नहीं? जितनी भी परम्पराएं या मान्यताएं हैं या धर्म-संस्थाएं हैं, वे भी धर्म से अनुप्राणित हैं या नहीं? इन सबकी पहचान या कसौटी अहिंसा है।

अहिंसा के अतिरिक्त और कोई आधार नहीं, जो खण्ड-खण्ड होती हुई मानव जाति को एकरूपता दे सके या एक सूत्र में ग्रथित कर सके। विश्व के प्रत्येक प्राणी को सुरक्षा का आश्वासन, सृजनात्मक स्वातन्त्र्य का विश्वास, आत्मौपम्य दृष्टिमूलक अहिंसा ही दिला सकती है। मानवों के साथ कल्पित इन औपचारिक भेदों को मिटाकर सद्भावना स्थापित करना अहिंसा का ही कार्य है। शिवार्य का भगवती आराधना में कहना है- “जिस प्रकार अणु से छोटी कोई वस्तु नहीं है, और आकाश से बड़ी कोई वस्तु नहीं, ठीक उसी तरह विश्व में अहिंसा से बढ़कर अन्य कोई व्रत या नियम नहीं है।” (गाथा 784)

शान्ति का हनन हिंसा तथा उसकी रक्षा करना अहिंसा है। अहिंसा कायरों का नहीं, वीरों का धर्म है। अहिंसक का हृदय उदार तो होता है पर निर्भय भी होता है। अहिंसक जीते जी शत्रु से हार नहीं मानता। अहिंसक हृदय प्रायः अवसरों पर मौन रहता है, किन्तु जब विरोधी के विरोध का अवसर आता है तो पाषाण से भी कठोर हो जाता है। दूसरों के तनिक से कष्ट पर उसका मन रो उठता है और उनकी रक्षा के अवसरों पर सिंहवृत्ति धारण कर लेता है।

आध्यात्मिक क्षेत्र में तो अहिंसा की अनिवार्यता ही है, इसके बिना आध्यात्मिक गति ही नहीं है। व्यावहारिक जीवन के जितने भी पक्ष हैं, उन सबमें अहिंसा की मुख्यता है। माता की ममता, पिता का दुलार, भगिनी का स्नेह, पुत्र की भक्ति, राजा की सुव्यवस्था, आयात-निर्यात के साधन, आवागमन के संकेत, राजमार्गों पर प्रकाश, चौराहों पर दिशा-निर्देशक, रेल, मोटरगाड़ी, स्कूटर, साईकिल आदि की लाल बत्तियां- आदि सभी अहिंसा के ही भाग हैं।

अहिंसा में अलौकिक वीरत्व भी है, पर उसकी प्रधानता साधु के जीवन में है, जिसके शत्रु बाहर के पशु व मनुष्यादि नहीं हैं, बल्कि अंतरंग के मानसिक विकार हैं, जिनके साथ वह निरन्तर युद्ध करता रहता है।

सभी जीव जीना चाहते हैं

आज मानव जाति प्रकृति से हटकर विकृति की ओर बढ़ रही है। इसी का परिणाम है परस्पर का द्वेष बढ़ रहा है। प्रत्येक मानव एक दूसरे को विनष्ट करने पर तुला हुआ है। विनाश मानव का स्वभाव नहीं, विभाव है; प्रकृति नहीं, विकृति है। स्वभाव तो सृजन है, रक्षण है। जीवों की प्रकृति जीवित रहने की है, जैसा कि आचार्य कहते हैं-

सव्वे जीवा वि इच्छंति जीविउं ण मरिज्जिउं।

अर्थात् सभी जीव जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता। सभी को अपनी जिन्दगी के प्रति प्यार है, आदर व आकांक्षा है।

सभी अपनी सुख-सुविधाओं के लिए सतत प्रयत्नशील हैं। अपने अस्तित्व के लिए सभी संघर्षशील हैं। जैसा मैं हूँ वैसे सभी प्राणी जीवन धारण करने वाले हैं। शाश्वत सिद्धान्त को स्थापित करने वाली अहिंसा के सिवाय दूसरा कोई नहीं, यही इसकी सार्वभौमिकता-व्यावहारिकता है। आचार्य शिवार्य द्वारा भी कहा गया है-

जह ते न पियं दुक्खं तहेव तेसिं पि जाण जीवाणं। एवं णच्चा अप्पोवमिओ जीवेसु होदि सदा॥ ७७७ -मूलाराधना

जिस प्रकार स्वयं को दुःख अच्छा नहीं लगता, उसी प्रकार दूसरों को भी जानना चाहिए। सम्पूर्ण प्राणियों को अपने समान मानना योग्य है।

आचारांगसूत्र में भी यही भाव पाया जाता है- सभी प्राणियों को अपने प्राण प्रिय हैं, वे सुख की इच्छा करते हैं और दुःख को प्रतिकूल मानते हैं। वे मरण नहीं चाहते, जीवित रहना चाहते हैं, सबको जीवन प्रिय है। दशवैकालिक में भी यही कथन है कि-

सव्वे जीवा वि इच्छंति जीविउं न मरिज्जिउं। तम्हा पाणवहं घोरं निग्गंथा वज्जयंति णं॥ -दशवैकालिक, अ. 6, गाथा […]

सभी प्राणी जीवित रहना चाहते हैं, मरण नहीं चाहते हैं। प्राणिवध घोर निन्द्य कृत्य समझकर निर्ग्रन्थ मुनि उससे दूर रहते हैं।

हिंसा और प्रमाद

रागादि भावों से ग्रस्त होना प्रमाद कहलाता है। इसीलिए हिंसा और प्रमाद-रहित होने को अहिंसा कहा है। अहिंसा का यथार्थ स्वरूप राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ, भीरुता, शोक, घृणा आदि विकृत भावों का त्याग करना है। प्राणियों के प्राण नाश करने मात्र को हिंसा समझना ठीक नहीं है। तात्त्विक बात तो यह है कि यदि राग, द्वेष, मोह, क्रोध, अहंकार, लोभ, मात्सर्य आदि दुर्भाव विद्यमान हैं, तो अन्य प्राणी को घात न होते हुए भी हिंसा निश्चित है। यदि रागादि का अभाव है तो प्राणिघात होते हुए भी अहिंसा है, जैसा कि श्री अमृतचन्द्र स्वामी लिखते हैं-

अप्रादुर्भावः खलु रागादीनां भवत्यहिंसेति। तेषामेवोत्पत्तिर्हिंसेति जिनागमस्य संक्षेपः॥४४॥ -पुरुषार्थसिद्धयुपाय

रागादिक का अप्रादुर्भाव अहिंसा है, रागादिकों की उत्पत्ति हिंसा है, यह जिनागम का सार है।

आचार्य श्री अमृतचन्द्र ने जिनके ग्रन्थों की सर्वप्रथम संस्कृत व्याख्या लिखकर यश प्राप्त किया, उन आचार्यवर्य महर्षि कुन्दकुन्द ने लिखा है-

मरदु व जियदु व जीवो अयदाचारस्स णिच्छिदा हिंसा। पयदस्स णत्थि बंधो हिंसामित्तेण समिदस्स॥२१७॥ -प्रवचनसार

जीव मरे या जीवित रहे, अयत्नाचारी के हिंसा निश्चित है, यत्नाचारी के हिंसामात्र से बन्ध नहीं है।

स्वयं अहिंसा स्वयमेव हिंसनं न तत्पराधीनमिह द्वयं भवेत्। प्रमादहीनोऽत्र भवत्यहिंसकः प्रमादयुक्तस्तु सदैव हिंसकः॥ -धवला, पु. 4, 5.6.93

प्रमादहीन ही जीव-रक्षा का प्रयत्न कर सकता है, जीवों का मरण हो या न हो। अयत्नपूर्वक प्रवृत्ति करता है वह हिंसा करता है, जो यत्नपूर्वक आचरण करता है, वह अहिंसक होता है।

अयदाचारो समणो छस्सु वि कायेसु वधकरो त्ति मदो। चरदि जदं जदि णिच्चं कमलं व जले णिरुवलेवो॥ -प्रवचनसार, ३८

यत्नाचार रहित श्रमण छहों कायों के जीवों का वध करने वाला कहा गया है। यदि वह यत्नपूर्वक प्रवृत्त होता है तो जैसे कमल जल से लिप्त नहीं होता है, वैसे वह हिंसा से लिप्त नहीं होता।

हिंसा का दोष मुख्यरूप से असावधानी-प्रमादयोग से ही होता है, इसीलिए हिंसा की परिभाषा देते हुए तत्त्वार्थसूत्रकार आचार्य उमास्वामी लिखते हैं- “प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा”। इस सूत्र में आचार्य ने ‘प्रमत्तयोग’ पद को विशेष रूप से प्रयुक्त किया है, क्योंकि यदि राग-द्वेष का सद्भाव है, भले ही किसी जीवधारी के प्राणों का नाश न हो, किन्तु कषायवान् व्यक्ति अपनी निर्मल मनोवृत्ति का तो घात करता ही रहता है। अतः स्वप्राणघातरूप प्राणव्यपरोपण भी पाया जाता है। स्वप्राणघात महापाप ही है, हिंसा का दोष तो है ही। यह निश्चित है कि हिंसा और अहिंसा भावों की अपेक्षा अवश्य रखती है। जैसा कि आचार्य अमृतचन्द्रसूरि ने भी लिखा है- “पर पदार्थ के निमित्त से मनुष्य को हिंसा का रंचमात्र भी दोष नहीं लगता, फिर भी हिंसा के आयतनों की निवृत्ति परिणामों की निर्मलता के लिए करनी चाहिए।” इससे स्पष्ट होता है कि हिंसा का अन्वय-व्यतिरेक अशुद्ध तथा शुद्ध परिणामों के साथ है। परिणामभाव पूर्ण अहिंसा के मुख्य रूप से साधक हैं, क्योंकि बिना भाव अहिंसा के द्रव्य अहिंसा का पूर्ण पालक साधक मुक्ति प्राप्त नहीं कर पाता है। पं. आशाधर जी भी समझाते हैं- “यदि भाव के अधीन बन्ध-मोक्ष की व्यवस्था न मानी जाय, तो संसार का वह कौन सा भाग होगा, जहाँ पहुँचकर मुमुक्षु पूर्ण अहिंसक बनने की साधना को पूर्ण करते हुए निर्वाण-लाभ करेगा?” इससे स्पष्ट है कि लोक का कोई भी भाग ऐसा नहीं है, जहाँ पूर्ण द्रव्य अहिंसक रह सके, क्योंकि प्रत्येक स्थान पर जीवराशि है, किन्तु साधना के फलस्वरूप साधक पूर्ण रूप से भाव अहिंसा का पालन कर ही परम लक्ष्य सिद्ध कर लेता है।

गृहस्थ की अहिंसा

गृहस्थ भाव अहिंसा का पूर्ण पालन नहीं कर सकता। वह केवल त्रस प्राणियों की हिंसा से विरत होता है। वह निरपराध प्राणियों को मन, वचन और काय से न स्वयं मारता है और न दूसरों से मरवाता है। वह ऐसी कोई भी प्रवृत्ति नहीं करता-करवाता है, जिससे स्थूल हिंसा की संभावना हो।

अहिंसक गृहस्थ बिना प्रयोजन संकल्पपूर्वक तुच्छ प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचाता है, किन्तु धर्म, समाज, परिवार की रक्षा हेतु या किसी विशिष्ट कर्तव्यपालन हेतु न्यायवान् होकर अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग करने से भी मुख नहीं मोड़ता है। आचार्य सोमदेव ने भी गृहस्थों को विरोधी हिंसा में दोष नहीं कहा। विरोधी हिंसा उस समय होती है, जब अपने ऊपर आक्रमण करने वाले पर आत्मरक्षार्थ शस्त्रादि का प्रयोग करना आवश्यक होता है, जैसे अन्यायवृत्ति से कोई दूसरे राष्ट्रवाला अपने देश पर आक्रमण करे, उस समय अपने आश्रितों की रक्षा के लिए संग्राम में प्रवृत्ति करना, उसमें होने वाली हिंसा विरोधी हिंसा है।

जीवन-रक्षार्थ शरीर का भरण-पोषण करने के लिए आहार-पान आदि के निमित्त होने वाली हिंसा आरम्भी हिंसा है।

जो खेती, व्यापार आदि जीविका के उचित उपायों को करने में होती है, वह उद्योगी हिंसा है।

उन हिंसाओं से एक गृहस्थ किसी भी प्रकार नहीं बच सकता है, परन्तु उसे विवेकपूर्वक ही कार्य करना चाहिए। विवेकपूर्वक कार्य करने से वह हिंसा से बच सकेगा और अहिंसा का पूर्ण पालन कर सकेगा। वह जो भी कार्य करता है या करवाता है, उसमें वह पूर्ण सावधानी रखता है कि किसी को कष्ट न हो, किसी की हिंसा न हो, किसी के प्रति अन्याय न हो। विवेकपूर्वक पूर्ण सावधानी रखने पर भी यदि किसी प्राणी की हिंसा हो जाय तो श्रावक के अहिंसा व्रत का भंग नहीं होता है। अहिंसा के अभाव में जीवन का अस्तित्व ही नहीं रहता।

जीवन में अहिंसा की व्यावहारिकता

जिनेन्द्र वाणी से शाश्वत सिद्धान्त निकला है कि सभी जीव सुख चाहते हैं, जीना चाहते हैं। अतः किसी को भी दुःख देना और मारना अपना ही बुरा करना-कराना है। यदि कोई दूसरे को दुःख देता या मारता है, तो वह अपने को ही दुःख देता-मारता है।

प्राणिमात्र की रक्षा करना-अभय देना-सभी को समान देखना अहिंसा है। किसी साहित्यकार ने अहिंसा को इन शब्दों में भी प्रस्तुत किया है- “अपने मन, वाणी व शरीर के द्वारा तथा असावधानी से किसी भी प्राणी को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी प्रकार का कष्ट न पहुँचाना, और इसी भावना के अनुरूप अपने नित्यकर्म बहुत सावधानीपूर्वक करना अहिंसा है। यह परिणामों को शुद्ध बनाने वाला रसायन है, मर्यादा या व्रत का मुख्य द्वार है, इसलिये आत्मकल्याणार्थी को अहिंसा आदि व्रतों में दृढ़ होते हुए संसारी पदार्थों से मोह-ममता का त्याग कर मोक्ष-मार्ग को प्रशस्त करना चाहिए। यही जीवन में अहिंसा की व्यावहारिकता है।”

अहिंसा भूतानां जगति विदितं ब्रह्म परमम्- बृहत्स्वयम्भूस्तोत्र।

अहिंसा परमो धर्मः- महाभारत।

स्रोत

यह लेख शोध-पत्रिका ‘अनेकान्त’ के वर्ष 55, अंक 1 (January–March 2002) में प्रकाशित हुआ था। मूल मुद्रित पृष्ठ सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट के डिजिटल संग्रह ‘पत्रिका’ में सुरक्षित हैं — पत्रिका पर मूल लेख देखें।

प्रस्तुति: पुराने मुद्रित पाठको डिजिटल रूपमें लाते समय केवल छपाई और स्कैनकी त्रुटियाँ सुधारी गई हैं; लेखकके शब्द और उस समयकी वर्तनी यथावत् रखी गई है। उपशीर्षक पाठकोंकी सुविधाके लिए जोड़े गए हैं।