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महावीर के महावाक्य

महावीर के महावाक्य तीन मूल उपदेशों में समाए हैं: मनुष्य को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, दूसरों को दुख देने वाली हिंसा त्यागनी चाहिए, और संयम से इच्छाओं पर अंकुश रखना चाहिए।

‘महावीर के महावाक्य’ — अनेकान्त (1962) से जगदीशचन्द्र जैन का लेख
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  1. महावीर के समय का समाज
  2. प्रथम महावाक्य: कर्म का फल
  3. दूसरा महावाक्य: कर्म से ही ब्राह्मण
  4. अहिंसा और समभाव
  5. सच्चे त्यागी का लक्षण
  6. निष्कर्ष
  7. स्रोत

संसार में समय-समय पर महान् पुरुषों का प्रादुर्भाव होता आया है। महापुरुषों ने जन कल्याण के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया और भूली-भटकी जनता को सुमार्ग पर लगाया। महावीर वर्धमान भी ऐसे ही महान व्यक्ति थे।

उनका उपदेश था—

  1. मनुष्य को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है इस लिये दूसरों को दुख पहुँचाने वाला कर्म नहीं करना चाहिए।

  2. दूसरों को दुख पहुंचाने वाले हिंसात्मक कर्म से दूर रहना चाहिए—इसे अहिंसा कहते हैं।

  3. हिंसात्मक कर्मों का त्याग करने के लिए संयम द्वारा अपनी इच्छाओं पर अंकुश रखना आवश्यक है। यदि हम ऐसा नहीं करते तो हम दूसरों को उनके हक से वंचित रखते हैं।

संक्षेप में भगवान् महावीर के यही मूल सिद्धांत हैं।

महावीर के समय का समाज

महावीर के सिद्धांतों को ठीक तरह समझने के लिए हमें आज से लगभग अढाई हज़ार वर्ष पहले के भारत की ओर जाना होगा। उन दिनों सामंतशाही का बोलबाला था। क्षत्रिय शासक ब्राह्मण पुरोहितों के साथ गठबंधन करके राज्य का संचालन करते थे। इन दोनों वर्गों के हाथ में सारी सत्ता थी जिससे समाज का नियंत्रण होता था। तरह तरह के धार्मिक आडम्बरों में तत्कालीन समाज जकड़ा हुआ था। क्षत्रिय शासक और ब्राह्मण पुरोहितों का यह वर्ग अपनी खुशी और सुख-सुविधा के लिए जन-समाज का भरपूर शोषण कर हीन कहे जाने वाले लोगों से हर प्रकार का काम लेता और दास वृत्ति करने के लिए उन्हें बाध्य करता। इसके फलस्वरूप धार्मिक, और सामाजिक और जात-पाँत के आडंबरों में फंसकर जन-साधारण अपना मान ही खो बैठा और पशु से भी बदतर जीवन बिताने के लिए बाध्य हो गया। शोषण की यह व्यवस्था सैकड़ों-हजारों वर्ष तक लगातार चलती रही। नतीजा यह हुआ कि सामंत सामंत बने रहे और साधारण वर्ग गुलामी की चक्की में पिसता रहा। और तारीफ़ की बात यह कि सामंतों ने अपने दुष्कर्मों से छुटकारा पाने के लिए ब्राह्मणों का आश्रय ढूंढा, और ब्राह्मणों ने भी यज्ञ, त्याग, जप, तप आदि कर्मकांड के विधान द्वारा सामंतों को उनके पाप कर्म के बंधन से मुक्त करने का फ़तवा दे दिया।

ऐसी विषम परिस्थितियों से पूर्ण समाज को गुलामी के पाप से छुड़ाना कितना दुष्कर होगा? ऐसे अव्यवस्थित और अस्त व्यस्त समाज में ज्ञातृ पुत्र महावीर और गौतम बुद्ध नामक दो महान शक्तियों का आविर्भाव हुआ; दोनों ने मनुष्य मात्र की समानता पर ज़ोर देते हुए अच्छे और बुरे कर्म के आधार पर ही ऊँच-नीच को स्वीकार किया।

प्रथम महावाक्य: कर्म का फल

जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर वर्धमान का जन्म बिहार राज्य की उस वैशाली नगरी में हुआ था जहाँ लिच्छवि लोग गणतंत्र द्वारा अपना शासन चलाते थे। भगवान महावीर के कर्म सिद्धांत की जड़ इन्हीं लिच्छवियों की गणतंत्र की भावना से आरम्भ हुई जान पड़ती है। उनका प्रथम महावाक्य है—

जमिणं जगई पुढो जगा, कम्मेहिं लुप्पंति पाणिणो। सयमेव कडेहिं गाहइ, नो तस्स मुच्चेज्जऽपुट्ठयं॥

अच्छा या बुरा जैसा भी कर्म हो, उसका फल भोगे बिना छुटकारा नहीं। संसार में जितने भी प्राणी हैं सब अपने कर्मों के कारण दुखी हैं।

भगवान महावीर ने बार-बार इस बात को कहा है कि मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्यमेव भोगना पड़ता है; जो जैसा करता है, वैसा फल पाता है। मनुष्य चाहे जो कर सकता है, चाहे जो बन सकता है और वह अपने भाग्य का विधाता स्वयं है। इसीलिये महावीर के निर्ग्रन्थ प्रवचन में ईश्वर को जगत् का कर्ता स्वीकार नहीं किया गया; तप आदि सत्कर्मों द्वारा आत्मविकास की सर्वोच्च अवस्था को ही ईश्वर बताया गया है। जैनधर्म की भारतीय दर्शन को यह बहुत बड़ी देन है।

ऐसी स्थिति में जो लोग जाति-पाँति के भेद के कारण कर्म के बंधन में फंसकर अपने को इन्सान समझना ही छोड़ देते थे, उनके लिए महावीर का यह सिद्धांत कितना प्रेरणादायक रहा होगा और उन्हें तत्कालीन सामंती समाज के खिलाफ़ कितना विद्रोह करना पड़ा होगा। मनुष्यमात्र में आत्मविश्वास की दृढ़ भावना पैदा कर देना उसमें पुरुषार्थ की चिनगारी फूंक देना—इससे बढ़कर भला जनकल्याणकारी सिद्धांत और कौन-सा हो सकता है?

दूसरा महावाक्य: कर्म से ही ब्राह्मण

इसी कर्म सिद्धांत को ध्यान में रखकर वेदों को मानने वाले ब्राह्मणों को लक्ष्य करते हुए महावीर भगवान ने दूसरा महावाक्य कहा है।

उदगेण जे सिद्धिमुदाहरंति, सायं च पायं उदगं फुसंता। उदगस्स फासेण सिया य सिद्धी, सिज्झिंसु पाणा बहवे दगंसि॥

—सुबह और शाम स्नान करने से यदि मोक्ष मिलता हो तो पानी में रहने वाले सभी जीव-जन्तुओं को मोक्ष मिल जाना चाहिए। इसीको स्पष्ट करते हुए कहा गया है—

न वि मुंडिएण समणो, न ओंकारेण बंभणो। न मुणी रण्णवासेण, कुसचीरेण ण तावसो॥

सिर मुंडा लेने से कोई श्रमण नहीं होता, ओम का जाप करने से ब्राह्मण नहीं होता, जंगल में रहने से मुनि नहीं होता, और कुश के वस्त्र पहनने से तपस्वी नहीं होता।

तो फिर किससे होता है?

कम्मुणा बंभणो होइ, कम्मुणा होइ खत्तिओ। वइसो कम्मुणा होइ, सुद्दो हवइ कम्मुणा॥

—मनुष्य अपने कर्म से ब्राह्मण, कर्म से क्षत्रिय, कर्म से वैश्य और कर्म से ही शूद्र होता है।

अहिंसा और समभाव

महावीर भगवान ने यज्ञ, याग, जप, तप और दान धर्म आदि कर्मकाण्ड का विरोध करते हुए कहा है कि इन सब बातों से कर्म का नाश नहीं हो सकता, कर्म फल तो भोगना ही पड़ेगा। इसलिए यदि हम समाज को आदर्श की ओर ले जाना चाहते हैं, उसमें शांति और व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं तो हर हालत में बुरे कर्मों और बुरे विचारों का त्याग करना पड़ेगा। तथा मनुष्य अपने विचारों और कर्मों में पूर्ण स्वतंत्रता तभी प्राप्त कर सकता है जब कि वह स्वप्न में भी दूसरे की धन-सम्पत्ति पर नज़र डालने और दूसरे का हक़ हड़प लेने की मनोवृत्ति को छोड़ दे। इस प्रकार की सदिच्छा को महावीर ने अहिंसा कहा है। उनका महावाक्य है—

समया सव्वभूएसु, सत्तुमित्तेसु वा जगे। पाणाइवायविरई, जावज्जीवाए दुक्करं॥

सब जीवों के प्रति चाहे वह शत्रु हो या मित्र समभाव रखना और जीव हिंसा का त्याग करना बहुत कठिन है।

सत्य होने पर भी, कठोर वचन बोलने को महावीर भगवान् ने हिंसा कहा है—

तहेव फरुसा भासा, गुरुभूओवघाइणी। सच्चा वि सा न वत्तव्वा, जओ पावस्स आगमो॥

दूसरों को दुख पहुँचाने वाली कठोर भाषा यदि सत्य भी हो तो उसे न बोले—इससे पाप का आश्रव होता है।

इस उपदेश से बढ़कर जनहित की भावना और क्या हो सकती है? बुद्ध के उपदेशों में इसे ही बहुजनहित कहा है।

सच्चे त्यागी का लक्षण

लेकिन अहिंसा को पालना, उसके सिद्धांत को अपने जीवन में उतारना आसान काम नहीं है। उसके लिए आत्मदमन, इन्द्रियजय, कायक्लेश और कष्ट सहन करने की आवश्यकता होती है। महावीर ने कहा है कि मनुष्य की इच्छा आकाश के समान अनन्त है, ऐसी हालत में कैलाश पर्वत के समान सोने-चाँदी के असंख्य पर्वत भी उसकी इच्छा को तृप्त नहीं कर सकते। इसलिए भगवान् ने सच्चे त्यागी का लक्षण बताते हुए कहा है—

जे य कंते पिए भोए, लद्धे वि पिट्ठिकुव्वइ। साहीणे चयइ भोए, से हु चाइ त्ति वुच्चइ॥

वत्थगंधमलंकारं, इत्थीओ सयणाणि य। अच्छंदा जे न भुंजंति, न से चाइ त्ति वुच्चइ॥

जो सुन्दर और प्रिय भोगों को पाकर भी उनकी ओर से पीठ फेर लेता है, और सामने आए हुए भोगों का त्याग कर देता है, वही त्यागी है। वस्त्र, गंध, अलंकार, स्त्री और शयन आदि वस्तुओं का जो लाचारी के कारण भोग नहीं कर सकता, उसे त्यागी नहीं कहते।

निष्कर्ष

निष्कर्ष यह है—

१. भगवान महावीर का कथन था कि यदि संसार में सुख और सुख के साधन परिमित हों तो उपभोग की वस्तुओं का बँटवारा करने के लिए किसी न किसी को त्याग अवश्य करना पड़ेगा। इस प्रकारकी मूल भावना के सिद्धांत को ही अहिंसा कहा है।

अहिंसावृत्ति का पालन करने के लिए अपनी इन्द्रियों पर अंकुश रखते हुए भोग-उपभोग की सामग्री का त्याग करना अत्यंत कठिन है जो मानसिक संतुलन के बिना संभव नहीं।

स्रोत

यह लेख शोध-पत्रिका ‘अनेकान्त’ के वर्ष 15, अंक 1 (Chaitra 1962) में प्रकाशित हुआ था। मूल मुद्रित पृष्ठ सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट के डिजिटल संग्रह ‘पत्रिका’ में सुरक्षित हैं — पत्रिका पर मूल लेख देखें।

प्रस्तुति: पुराने मुद्रित पाठको डिजिटल रूपमें लाते समय केवल छपाई और स्कैनकी त्रुटियाँ सुधारी गई हैं; लेखकके शब्द और उस समयकी वर्तनी यथावत् रखी गई है। उपशीर्षक पाठकोंकी सुविधाके लिए जोड़े गए हैं।