राजस्थान के इतिहास निर्माण में जैन ग्रन्थ संग्रहालयों का महत्त्व
राजस्थान के जैन ग्रंथ संग्रहालयों में लगभग डेढ़ लाख पाण्डुलिपियाँ सुरक्षित हैं, जिनकी प्रशस्तियों में शासकों, नगरों, व्यापार और सामाजिक जीवन की प्रचुर ऐतिहासिक सामग्री है। राजस्थान इतिहास कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन, जोधपुर में दिया गया भाषण।

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भारतीय इतिहास में राजस्थान का महत्वपूर्ण स्थान है। इतिहास के सैकड़ों पृष्ठ इस प्रदेश के निवासियों की वीरता एवं पराक्रम की कहानियों से भरे पड़े हैं। वास्तव में यहाँ के शासकों एवं शासितों ने देश के इतिहास को कितनी ही बार मोड़ दिया था। यहाँ के रणथम्भौर, चित्तौर, भरतपुर, जोधपुर, जैसलमेर जैसे दुर्ग वीरता शौर्य एवं शक्ति के आधार स्तम्भ रहे थे किन्तु वीरता के साथ साथ यहाँ भारतीय साहित्य एवं संस्कृति के गौरवस्थल भी पर्याप्त संख्या में मिलते हैं। यदि राजस्थानी वीर योद्धाओं ने जननी जन्मभूमि की रक्षार्थ हँसते-हंसते प्राणों को न्योछावर किया तो यहाँ होने वाले आचार्यों, मुनियों, सन्तों एवं विद्वानों ने भी अपनी कृतियों द्वारा जनता में देश भक्ति नैतिकता एवं सांस्कृतिक जागरुकता का प्रचार किया। उन्होंने नागौर, बीकानेर, अजमेर, जैसलमेर, जयपुर आदि कितने ही नगरों में ग्रंथ भंडारों के रूप में साहित्यिक दुर्ग स्थापित किये जहाँ भारतीय साहित्य एवं संस्कृति की सुरक्षा एवं उसके विकास के उपाय सोचे गये तथा सारे प्रदेश में ग्रंथों की प्रतिलिपियां करवाने, उनके पठन पाठन का प्रचार करने का कार्य व्यवस्थित रूप से किया गया और राजनैतिक उथल-पुथल एवं सामाजिक झगड़ों से इन शास्त्र भंडारों को दूर रखा गया। वास्तव में साहित्य की सुरक्षा एवं उसकी श्रीवृद्धि में सबसे अधिक जन सहयोग जैन ग्रंथ संग्रहालयों का रहा यही कारण है कि जैन ग्रंथ संग्रहालय राजस्थान के छोटे-छोटे गाँवों तक में मिलते हैं। इन शास्त्र भंडारों ने राजस्थान के इतिहास के कितने ही महत्वपूर्ण तथ्यों को संजोया और उसे सदा ही नष्ट होने से बचाया।
राजस्थान के जैन ग्रंथ संग्रहालय और उनकी पाण्डुलिपियाँ
यदि हम इन ग्रंथ भंडारों के संबंध में कुछ गम्भीरता से विचार करें तो हमें मालूम होगा कि राजस्थान में जैन ग्रंथ संग्रहालय सबसे अधिक संख्या में मिलते हैं। ये ग्रंथ संग्रहालय छोटे-छोटे गाँवों से लेकर बड़े २ नगरों तक में स्थापित किये हुए हैं। इन संग्रहालयों की निश्चित संख्या एवं उनमें संग्रहीत पाण्डुलिपियों की संख्या बतलाना तो कठिन है लेकिन अब तक की खोज के आधार पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इन हस्तलिखित ग्रंथों की संख्या १॥ लाख से कम नहीं होगी। जयपुर, बीकानेर, अजमेर, जैसलमेर, बूंदी जैसे नगरों में एक से अधिक ग्रंथ संग्रहालय हैं। अकेले जयपुर नगर में ऐसे २५ ग्रंथ भंडार हैं जिनमें सभी में हस्तलिखित पाण्डुलिपियों का अच्छा संग्रह है। इनमें संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, हिन्दी, राजस्थानी भाषा के हजारों ग्रंथों की पाण्डुलिपियाँ सुरक्षित हैं। ताडपत्र पर सबसे प्राचीन पाण्डुलिपि सन् १०६० की है जो जैसलमेर के वृहद ज्ञान भंडार में संग्रहीत है इसी तरह कागज पर संवत् १३२९ (सन् १२७२) की पाण्डुलिपि जयपुर के श्री दिगम्बर जैन मन्दिर तेरहपंथियों के शास्त्र भंडार के संग्रह में है। कागज वाली पाण्डुलिपि में देहली का नाम योगिनीपुर एवं तत्कालीन सम्राट का नाम गयासुद्दीन तुगलक के नाम का उल्लेख है। इन भंडारों में तेरहवीं, १४वीं शताब्दी से लेकर १९वीं शताब्दी तक लिखे गये ग्रंथों का विशाल संग्रह है जिनमें भारतीय विद्या एवं संस्कृति के अमूल्य तत्व छिपे पड़े हैं।
यहाँ किसी एक विषय पर अथवा एक ही भाषा में ये पाण्डुलिपियाँ संग्रहीत नहीं हैं किन्तु धर्म, दर्शन, पुराण, कथा, काव्य एवं चरित के अतिरिक्त इतिहास, ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद संगीत जैसे लौकिक विषयों पर अच्छी से अच्छी कृतियों की पाण्डुलिपियाँ उपलब्ध होती हैं। यहाँ मैं यह बतलाना चाहूँगा कि जैनाचार्यों एवं विद्वानों ने भाषा विशेष से कभी मोह नहीं रखा किन्तु जनता की माँग के अनुसार इन्होंने अपनी कृतियों का निर्माण एवं उनका संग्रह किया। इसीलिए आज इन भंडारों में प्राकृत एवं संस्कृत की कृतियों के अतिरिक्त अपभ्रंश हिन्दी एवं राजस्थानी कृतियां भी पर्याप्त संख्या में मिलती हैं। इसलिए ये प्राचीन साहित्य, इतिहास एवं संस्कृति के अध्ययन करने के लिये प्रामाणिक केन्द्र हैं।
ग्रंथ भंडारों की खोज का इतिहास
लेकिन राजस्थान के इन जैन ग्रंथ संग्रहालयों की महत्ता की ओर विद्वानों का सर्वप्रथम ध्यान आकृष्ट करने का श्रेय पाश्चात्य विद्वान कर्नल जेम्स टाड को है जिन्होंने अपनी पुस्तक (Annals and Antiquities of Rajasthan) में जैसलमेर के जैन ग्रन्थ संग्रहालयों का बहुत ही सुन्दर एवं रोचक वर्णन किया। टाड के ४५ वर्ष पश्चात् डा० ब्हूलर एवं डा० जैकोबी जैसे विद्वानों ने जैसलमेर के ग्रंथ भंडारों का निरीक्षण किया और यहाँ की साहित्य समृद्धि की ओर विद्वानों को स्मरण कराया। इन तीन पाश्चात्य विद्वानों के महत्वपूर्ण एवं खोजपूर्ण लेखों के कारण भारतीय विद्वानों का भी उनकी ओर ध्यान आकृष्ट हुआ। सन् १९०४ में भारतीय विद्वानों में सर्वप्रथम श्रीधर भण्डारकर जैसलमेर गये और अपनी इस यात्रा का वर्णन सन् १९०६ की खोज रिपोर्ट में प्रकाशित कराया इसके पश्चात् कितने ही विद्वान यहाँ के भण्डारों को देखने के लिए जाते रहे जिनमें पं० हीरालाल, हंसराज, सी. डी. दलाल, मुनि पुन्यविजय जी एवं मुनि जिनविजय जी के नाम उल्लेखनीय हैं।
जैसलमेर के ग्रंथ भंडारों के अतिरिक्त राजस्थान के अन्य शास्त्र भंडारों की ओर विद्वानों का विशेष ध्यान होते हुए भी कुछ वर्ष पूर्व तक किसी भी भारतीय विद्वानों ने उन्हें व्यवस्थित रूप से नहीं देखा और साहित्य की अमूल्य निधियां उनमें ऐसे ही बन्द पड़ी रहीं। बीकानेर, चूरू सरदार शहर आदि कुछ नगरों में स्थित ग्रंथ भंडारों की सूचियां तो अवश्य बनायी गईं तथा श्री अगरचंद जी नाहटा जुगलकिशोर जी मुख्तार एवं पं. परमानंद जी शास्त्री ने अपने लेखों में किसी किसी भंडार पर प्रकाश भी डाला। लेकिन विद्वानों के समक्ष उनके सम्बन्ध में जानकारी प्रस्तुत करने का कभी व्यवस्थित कार्य नहीं किया जा सका।
राजस्थान के इन भण्डारों की छानबीन के लिये प्रेरणा देने का सबसे अधिक श्रेय पं. चैनसुखदास जी न्यायतीर्थ जयपुर को है। इस दिशा में श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी का साहित्य शोध विभाग की सेवाएँ उल्लेखनीय हैं इसका मुख्य उद्देश्य राजस्थान के जैन शास्त्र भंडारों की ग्रंथ सूचियाँ तैयार करने एवं उनमें अप्रकाशित साहित्य को प्रकाश में लाने का है। क्षेत्र के साहित्य शोध विभाग की ओर से इन भंडारों की ग्रंथ सूचियों के चार भाग छप चुके हैं जिनमें करीब २०,००० ग्रंथों की सूचियाँ हैं। मैंने अपना शोध प्रबन्ध भी 'जैन ग्रंथ भंडार इन राजस्थान' पर ही लिखा है। जिसमें राजस्थान के १०० ग्रंथ भंडारों पर ऐतिहासिक दृष्टि से प्रथम बार लिखने का अवसर मिला। मैंने अपने शोध निबन्ध में उनकी साहित्यिक समृद्धि एवं विशाल संग्रह के सम्बन्ध में व्यवस्थित रूप से प्रकाश डालने का प्रयास किया है।
ग्रंथ भण्डारों की साहित्यिक समृद्धि
राजस्थान के इन ग्रंथ भण्डारों में ताडपत्र की पाण्डुलिपियों की दृष्टि से जैसलमेर का बृहद ज्ञान भण्डार अत्यधिक महत्वपूर्ण है किन्तु कागज पर लिखित पाण्डुलिपियों की दृष्टि से नागौर, बीकानेर, जयपुर एवं अजमेर के शास्त्र भण्डार उल्लेखनीय हैं। अकेले नागौर के भट्टारकीय शास्त्र भण्डार में १२००० हस्तलिखित ग्रंथ एवं २००० गुटकों का संग्रह है। गुटकों में संग्रहीत ग्रंथों की संख्या की जावे तो वह भी १००० से कम नहीं होगी। इसी तरह जयपुर में २५ से भी अधिक ग्रंथ संग्रहालय हैं जिनमें आमेर शास्त्र भण्डार, बड़ा दिगम्बर जैन मन्दिर तेरहपंथियों का शास्त्र भंडार, पाटोदियों के मन्दिर का शास्त्र भंडार आदि का नाम उल्लेखनीय है। इन भंडारों में अपभ्रंश एवं हिन्दी ग्रंथों की पाण्डुलिपियों का अच्छा संग्रह है। इन शास्त्र भंडारों में जैन विद्वानों द्वारा लिखित ग्रंथों के अतिरिक्त जैनेतर विद्वानों द्वारा निबद्ध ग्रंथों की भी प्राचीनतम एवं महत्वपूर्ण पाण्डुलिपियों का संग्रह मिलता है। इनमें महापण्डित मम्मट विरचित काव्य प्रकाश, राजशेखर कृत काव्यमीमांसा, कुन्तक कवि कृत वक्रोक्तिजीवित, आचार्य धर्मकीर्ति कृत न्यायविन्दु, श्रीधर भट्ट कृत न्यायकन्दली आदि की पाण्डुलिपियों का अच्छा संग्रह है। नाटक साहित्य में विशाखदत्त का मुद्राराक्षस नाटक, भट्ट नारायण कृत वेणीसंहार, मुरारी कृत अनर्घराघव नाटक एवं कृष्णमिश्र का प्रबोध चन्द्रोदय नाटक, सुबन्धु कृत वासवदत्ता नाटक एवं अन्य सैकड़ों कृतियां भी इन भंडारों में सब मिलती हैं। हिन्दी राजस्थानी ग्रंथों की भी इन भंडारों में भारी संख्या में पाण्डुलिपियां मिलती हैं। अभी हाल में हिन्दी की एक प्राचीनतम कृति जिणदत्त चरित की एक पाण्डुलिपि उपलब्ध थी। इस काव्य का रचना काल संवत् १३५४ है। हिन्दी भाषा की संवतोल्लेख वाली कृति प्रथम बार प्राप्त हुई है। जो डा० माताप्रसाद जी गुप्त एवं मेरे द्वारा सम्पादित होकर प्रकाशित भी हो चुकी है। इसी तरह १४वीं एवं १५वीं शताब्दियों में रचित ग्रंथ भी यहाँ कितनी ही संख्या में मिलते हैं। इन्हीं भंडारों में पृथ्वीराज रासो, कृष्णरुक्मिणी वेलि, मधुमालती कथा, सिंहासनबत्तीसी, रसिकप्रिया एवं बिहारी सतसई की भी प्राचीनतम प्रतियां भी उपलब्ध हुई हैं।
इतिहास की दृष्टि से प्रशस्तियों का महत्त्व
अब मैं इतिहास की दृष्टि से इन शास्त्र भंडारों के महत्व पर प्रकाश डालना चाहूँगा। इन भंडारों में ऐतिहासिक कृतियों के अतिरिक्त जो अन्य पाण्डुलिपियाँ हैं उनमें जो प्रशस्तियां होती हैं वे इतिहास की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। ये प्रशस्ति ११वीं शताब्दी से लेकर १९वीं शताब्दी तक की हैं। वैसे प्रशस्तियां दो प्रकार की हैं एक स्वयं लेखक द्वारा लिखी हुई तथा दूसरी लिपिकारों द्वारा लिखी हुई होती हैं। ये दोनों ही प्रामाणिक होती हैं और जिनकी प्रामाणिकता में कभी शंका नहीं की जा सकती। ऐसा मालूम पड़ता है कि इन ग्रंथकारों एवं लिपिकारों ने इतिहास के महत्त्व को बहुत पहिले ही समझ लिया था और इसीलिए ग्रंथ लिखवाने वाले श्रावकों का, उनकी गुरुपरम्परा तथा तत्कालीन सम्राट अथवा शासक के नामोल्लेख के साथ-साथ उनके नगर का भी उल्लेख किया जाता था। राजस्थान के इन जैन भंडारों में संग्रहीत प्रतियों के मुख्य केन्द्र देहली, अजमेर, जैसलमेर, नागौर, तक्षकगढ़ (टोडारायसिंह), चम्पावती (चाकसू), डूंगरपुर, सागवाड़ा, चित्तौड़, उदयपुर, आमेर, बूंदी, बीकानेर आदि हैं। इसलिए इनके शासकों एवं राजस्थान के नगरों एवं कस्बों के नाम खूब मिलते हैं जिनके आधार पर यहाँ के ग्राम और नगरों का इतिहास पर भी अच्छा प्रकाश डाला जा सकता है।
लेखक प्रशस्तियों के समान ही जो ग्रंथ प्रशस्तियाँ होती हैं वे और भी महत्त्वपूर्ण होती हैं उनमें लेखक, अथवा ग्रंथकार अपने इतिहास के साथ-साथ अपने ग्राम नगर का भी अच्छा वर्णन करता है। अपभ्रंश, हिन्दी, राजस्थानी ग्रंथों में इस तरह के वर्णन मिलते हैं। १७वीं शताब्दी में होने वाले एक कवि ने अपनी यशोधर चौपाई में बूंदी एवं उसके शासक का निम्न शब्दों में वर्णन किया है।
बूंदी इन्द्रपुरी जखिपुरी कि कुबेरपुरी,
रिद्धि सिद्धि भरी द्वारिका सी धरी धर में।
धौलहर धाम घर घर में विचित्र वाम,
सर कामदेव जैसे सेवे सुखसर में।
बागी वाग वारुण बाजार वीथी विद्या बेर,
विबुध विनोद वानी बोले सुखित नर में।
तहां करे राज राव भावस्यंघ महाराज,
हिन्दु धर्म लाज पातिसाहि वाज कर में।
इसी तरह १८वीं शताब्दी में होने वाले कवि दिलाराम ने अपने 'दिलाराम विलास' में बूंदी नगर का वर्णन किया है जो उक्त वर्णन के ही समान है। सन १७६८ में कवि श्रुतसागर ने भरतपुर नगर एवं उसके संस्थापक महाराजा सूरजमल का निम्न प्रकार वर्णन किया है।
देस काठहड़ बिरजि में, बदनस्यंघ राजान।
ताके पुत्र है भलो, सुरिजमल गुणधाम॥
तेजपुंज रवि है मनो, न्यायनीति गुणवान।
ताको सुजस है जगत में, नयो दूसरो भान॥
तिनहु जू नगर बसाइयो, नाम भरतपुर तास।
ता राजा समदिष्टि है, पर विचार उपवास॥
१७वीं शताब्दी में कविवर बनारसीदास हिन्दी के अच्छे कवि थे वे आध्यात्मिक कवि तो थे ही किन्तु वे पहिले कवि हैं जिन्होंने अपना स्वयं का आत्मचरित लिखा था और जिसका नाम अर्द्धकथानक है। कवि ने देहली पर तीन बादशाहों का शासन काल देखा था। बादशाह अकबर की मृत्यु के समाचार जब कवि को मिले तो उन्होंने उसका इस प्रकार वर्णन किया है—
संवत् सोलहसे वासठा, आयौ कातिक पावस नठा।
छत्रपति अकबर साहि जलाल, नगर आगरे कीनौ काल॥२४६॥
आई खबर जौनपुर माँह, प्रजा अनाथ भई विन नाह।
पुरजन लोग भए भयभीत, हिरदै व्याकुलता मुख पीत॥२४७॥
जयपुर नगर की १८वीं, १९वीं शताब्दी में रचित काव्यों में अच्छा वर्णन मिलता है। इनमें दो काव्य विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। एक बुद्धि विलास जिसमें जयपुर नगर की स्थापना का जो चित्र उपस्थित किया गया है वह अत्यधिक सुन्दर एवं प्रामाणिक है। बुद्धिविलास एक जैन विद्वान बख्तराम की कृति है जिसे उसने संवत् १८२७ में समाप्त किया था जिसका प्रकाशन कुछ वर्षों पूर्व राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिर जोधपुर से हो चुका है। इसमें जयपुर नगर की स्थापना के अतिरिक्त वहाँ के राजवंश का भी अच्छा वर्णन किया गया है। इतिहास प्रेमी विद्वानों को इस ग्रंथ को अवश्य पढ़ना चाहिये।
पट्टावलियाँ और राजवंशों के वर्णन
इसी तरह जयपुर के ही एक शास्त्र भण्डार में संग्रहीत एक पट्टावली में जयपुर राजवंश का विस्तृत वर्णन मिलता है। राजस्थान के शासकों के अतिरिक्त देहली के शासकों के सम्बन्ध में भी कितनी ही पट्टावलियां मिलती हैं जिनमें बादशाहों के राज्यकाल का घड़ी एवं पल तक का समय लिखा हुआ है। जयपुर के ही दिगम्बर जैन तेरहपंथी मंदिर के शास्त्र भण्डार में एक संस्कृत की “राजवंश वर्णन” कृति है जिसमें पाण्डवों से लेकर बादशाह औरंगजेब तक होने वाले शासकों का पूरा समय लिखा हुआ है। हिन्दी में लिखित “पातिसाहि का व्यौरा” नामक कृति में पृथ्वीराज के संबंध में जो वर्णन किया गया है उसका भी एक अंश निम्न प्रकार है।
तब राजा पृथ्वीराज संजोगता परणी। जहि राजा कसा कुल सौला १६ सूरी का १०७० हुआ। ल्याके भरोसे परणी त्याओं। लड़ाई सावता कही। पणी रावा जैचंद पूंगलो प्रूज्यों नहीं। संजोगता सरूप हुई। तहि के बसी राजा हुओ। सौ म्हैला हौ न रहो। महीना पंदरा वारा ने नीसरयो नहीं।
इसी तरह इन शास्त्र भण्डारों में बीकानेर, जोधपुर, कोटा, अलवर करोली आदि राजवंशों का जहां तहां अच्छा वर्णन मिलता है। और जिसके समुचित अध्ययन की आवश्यकता है। उदयपुर, डूंगरपुर, सागवाड़ा के ग्रंथ भंडारों में उदयपुर के शासकों का जो उल्लेख मिलता है उनसे कितनी ही इतिहास की विस्तृत कड़ियों को जोड़ा जा सकता है।
जैसलमेर के शास्त्र भंडार में जो सन् ११५६ में लिखित उपदेश पद प्रकरण की जो पाण्डुलिपि मिली है उसकी प्रशस्ति में अजमेर नगर एवं उसके शासक का निम्न प्रकार उल्लेख मिलता है।
संवत् १२१२ चैत्र सुदि १३ गुरौ अद्येह श्री अजयमेरुदुर्गे समस्तराजावलि विराजित परम भट्टारक महाराजाधिराज श्री विग्रहदेव विजयराज्ये उपदेश टीका लेखीति।
ज्ञान के समुद्र: इतिहासकारों से आग्रह
राजस्थान के शासकों के अतिरिक्त यहां के नगरों का इतिहास, व्यापार का उतार चढ़ाव, विभिन्न जातियों की उत्पत्ति, यहां की सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन एवं विभिन्न मान्यताओं के संबंध में भी यहां प्रभूत साहित्य मिलता है। वास्तव में ये ज्ञान की विभिन्न धाराओं के भंडार हैं। ये भंडार ज्ञान के समुद्र हैं जिसके मन्थन से विभिन्न रत्न प्राप्त हो सकते हैं। इसलिए मुझे पूर्ण विश्वास है कि राजस्थान का इतिहास विशारद राजस्थान के इन ज्ञान भंडारों का उपयोग करेंगे और उनमें से राजस्थान के विस्तृत इतिहास के कण कण एकत्रित कर सकेंगे।
टिप्पणियाँ
जोधपुर में आयोजित राजस्थान इतिहास कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन पर दिया गया एक भाषण।
स्रोत
यह लेख शोध-पत्रिका ‘अनेकान्त’ के वर्ष 20, अंक 5 (December 1967) में प्रकाशित हुआ था। मूल मुद्रित पृष्ठ सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट के डिजिटल संग्रह ‘पत्रिका’ में सुरक्षित हैं — पत्रिका पर मूल लेख देखें।
प्रस्तुति: पुराने मुद्रित पाठको डिजिटल रूपमें लाते समय केवल छपाई और स्कैनकी त्रुटियाँ सुधारी गई हैं; लेखकके शब्द और उस समयकी वर्तनी यथावत् रखी गई है। उपशीर्षक पाठकोंकी सुविधाके लिए जोड़े गए हैं।



