पाँच प्राचीन दि० जैन मूर्तियाँ
मुनि कान्तिसागर एक पुरातत्त्वविद्द्वारा दिखाये गये चित्रोंके आधारपर पाँच प्राचीन दिगम्बर जैन मूर्तियोंका परिचय देते हैं और खेद प्रकट करते हैं कि जैन समाजका कोई सार्वजनिक पुरातत्त्व-संग्रहालय नहीं है।

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ता० २५-४-४८ रविवारका दिन था, मैं कुछ लेटे हुए डॉ० भांडारकरका जैन मूर्तिशास्त्रका वह नोट पढ़ रहा था जो ‘आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया’ इतिवृत्तमें प्रकट हुआ है। था भी निश्चिन्त, रविवारके दिन मैं भी अपनी लेखनीको कष्ट नहीं देता। यों तो “आराम” जैनमुनियोंकी जीवन-विषयक डिक्शनरीमें नहीं होता, भगवान महावीरने स्पष्ट शब्दोंमें बारबार कहा है “समयं गोयम मा पमायए” हे गौतम! क्षणमात्र भी प्रमाद न कर। उपर्युक्त नोट पूरा करके आँखें बन्द होना ही चाहती थीं, रोकना भी मैंने उचित नहीं समझा, इतनी देरमें मेरे सामने एक सज्जन आ पहुंचे जो पुरातत्वमें ही एम० ए० हैं, इसी विषयपर आचार्यत्वके लिये थीसिस—महानिबन्ध—भी लिखी है। मेरा मन तो था कि कह दूं कल आइये परन्तु आपने आते ही मेरे सम्मुख छह चित्र उपस्थित कर दिये। मुझे तो अत्यानन्द हुआ; क्योंकि पुरातत्त्व-संशोधनका राग जिसे लगा हो वह तो अपनी गवेषणा-विषयक रुचिकी पूर्तिके लिये पहाड़ों और खण्डहरोंमें घूमता ही रहता है, उसके लिये मार्गमें आनेवाली बाधाएँ कोई मूल्य नहीं रखतीं, जब मुझे तो घर बैठे ही ये चीजें प्राप्त होगईं और वह भी जैन पुरातत्त्वसे सम्बन्ध रखने वाली, फिर प्रसन्नता क्यों न हो? दिल उछलने लगा। मैंने बहुत चेष्टा की कि मैं इन्हें अभी अपने पास ही रखूं, कल लौटा दूंगा, पर जो सज्जन ये चित्र लाये थे उनके स्वामीकी आज्ञा रखनेकी न थी, न वे मुझे अभी नोट्स लेने देना ही चाहते थे। मैंने इन्हें खूब गौरसे देखा कि इनकी कला वगैरहका ठीकसे अध्ययन करलूं और बादमें कुछ पंक्तियाँ लिख लूँगा जिससे और अपरिचित जन भी इनके परिचयसे लाभान्वित हों, परन्तु मेरा अनुभव है कि जब तक मूल वस्तु—अवशेष—सम्मुख उपस्थित न हो तब तक उनका वास्तविक परिचय उचितरूपेण लिपिबद्ध नहीं किया जा सकता, क्योंकि कलाकार (पाठक भूलसे मुझे ही कलाकार न समझ बैठें) जब सामनेकी वस्तु देखता है और कलम हाथमें उठाता है तब उसकी मनोवृत्तियाँ केन्द्रित होकर उसके भीतर प्रवेश करनेकी चेष्टा करती हैं। वह सफल कहाँ तक होता है इसका निर्णय करना एतद्विषयक रुचि रखनेवाली जनताका काम है।
कलाकारका हृदय
सफल कलाकारका जीवन भी कई विलक्षणताओंका एक समन्वयात्मक केन्द्र है। उसके मस्तिष्ककी रेखाएँ ही इसका सच्चा प्रतीक है। वह कभी तो शान्त-मुद्रामें रहता है, कभी गाम्भीर्य भावोंकी मूर्तिसम प्रतीत होने लगता है और सबसे बड़ी विशेषता है वह अप्रसन्न कभी नहीं होता, जैसे कोई शिकारी शिकार न मिलनेपर भी—निराश होना मानों उसके जीवनके बाहरकी ही वस्तु हो। यदि स्पष्ट कह दिया जाय तो कलाकारका हृदय एक समुद्रके समान गम्भीर होता है। नदी-नाले जैसे एकत्र होकर रत्नाकरमें विलीन होजाते हैं ठीक उसी प्रकार ज्ञान-विज्ञानकी समस्त धाराएँ उसके हृदयमें समा जाती हैं, बिना इनके संगमके वह सफल कलाकार माना ही नहीं जासकता; तभी तो वह प्रस्तर और धातुओंपर प्रवाहित भावोंको समझकर विवेचना करनेको उद्यत रहता है। भावनाशील हृदय प्रत्येक स्थानको अपने विशेष दृष्टिकोणसे देखता है। यही कारण है कि जहाँ कीचड़ भी न हो वहाँ वह उत्तम सरोवर देखता है। कहनेका तात्पर्य यह कि जहाँपर पाषाणोंका या कलात्मक अवशेषोंका ढेर हो, वे हैं तो प्रस्तर, पर कलाकारके लिये वे तात्कालिक सांस्कृतिक प्रवाहोंका प्रधान केन्द्र मालूम देते हैं। कलाकारकी दुनिया ही निराली है। इसमें जो कुछ क्षण विचरण करनेका सौभाग्य प्राप्त करता है वही उपर्युक्त पंक्तियोंका साक्षात् अनुभव करनेकी क्षमता रखता है।
चित्रोंका अवलोकन
हाँ तो अब मैं अपने मूल विषयपर आजाऊँ। मुझे नोट्स न लेने दिये तब कुछ रंज-सा अवश्य हुआ, इसलिये कि इतनी सुन्दर जैनकलात्मक कृतिएँ होते हुए भी आज जैनी इनसे क्यों अपरिचित रहें? क्या प्रतिमा-निर्माण करवानेवालोंका यही उद्देश्य था? बिल्कुल नहीं। परन्तु जब मैंने जाना कि उसके स्वामीके यहाँ दो दिन चित्र रह सकते हैं और मैं वहाँ जाकर नोट कर लूँ तो उन्हें आपत्ति नहीं होगी, तब मैंने भी स्वीकार कर लिया। बादमें मैंने अपने दिलमें यही अन्दाज लगाया कि चित्र उसने इस भयसे शायद न रखे होंगे कि मैं कहीं उनकी प्रतिकृति उतरवा लूँ या ब्लॉक बनवा लूँ, अस्तु। चित्र चले गये पर मेरा मन उन्हींमें लगा रहा, सोच रहा था क्या ही अच्छा हो यदि रात छोटी होजाये और दिन निकलते ही मैं अभिलषित कार्यको कर डालूँ, पर अनहोनी बात थी।
तारीख २६-४-४८ को मैं बिहार प्रान्तके बहुत बड़े कलात्मक वस्तुसंरक्षकके यहाँपर सहयोगी बाबू पदमसिंह बललियाको लेकर पहुंचा ही। १२ बजनेका समय रहा होगा, मैं तो चाहता था कि वे श्रीमन्त मुझे चित्र अवलोकनार्थ देकर आरामकी नींद ले लें ताकि मैं शान्तिपूर्वक अपना काम निपटालूं, पर वे भी थे धुनके पक्के, बहुत धूप-छाँह देख चुके थे, मैं तो उनके सामने बच्चा था। चित्र मेरी टेबिलपर धरा गये और पाँच-सात मिनटके बाद वापिस लेनेकी भी तैयारी करने लगे। मैंने कहा, देखिये, ये काम उतना आसान नहीं कि पाँच-दस मिनटमें इनको समुचित रूपसे समझ लिया जाय। वे फिर अपने कामपर गये और मैं अपना और सारा काम छोड़कर प्रतिमा-चित्रोंका परिचय लिखने लगा, बीच-बीचमें वे आये और उनके मस्तिष्ककी रेखाओंमें मैं पढ़ रहा था कि जो कुछ काम मैं कर रहा हूँ वह आपको मान्य नहीं है। पर मैं भी मुँह नीचे दबाये लिखता ही गया, जो कुछ भी लिखा वही आपके सामने समुपस्थित करते हुए मैं आनन्दका अनुभव करता हूं। हो सकता है इनके परिचयसे और संस्कृतिप्रेमी भी मेरे आनन्दमें भाग बटावें।
पाँच प्राचीन दिगम्बर जैन मूर्तियाँ
प्रतिमा १: भगवान पार्श्वनाथ
१—यह प्रतिमा भगवान पार्श्वनाथजीकी है जैसा कि मस्तकोपरि सप्त फनोंसे सूचित होता है। निम्न भागमें सर्पाकृति नहीं है। यह प्रथा ही प्राचीनकालीन प्रतिमाओंमें नहीं थी या कम रही होगी। उपर्युक्त फने इतने सुन्दर बने हैं कि मध्य भागकी रेखाएँ भी सुस्पष्ट हैं। सर्पाकृति पृष्ठभागीय चरणोंसे प्रारम्भ हुई है जैसा कि उदयगिरिसे प्राप्त प्रतिमाओंमें पाई जाती है। प्रतिमा सर्वथा नग्न है। इसका शारीरिक गठन और तदुपरि जो पालिशकी स्निग्धता है उससे सौंदर्य स्वाभाविकतया खिल उठता है। हाथ घुटने तक लगते हैं और इस प्रकारसे अङ्गुलियाँ रखी हुई हैं मानो यह सजीव है। प्रतिमाका मुखमण्डल बहुत ही आकर्षक और शान्तभावोंको लिये हुए है। होठोंसे स्मितहास्य झलक उठता है। मस्तकपर घुँघरवाले केशोत्कीर्णित हैं। उष्णीष भी है। आँखें कायोत्सर्ग मुद्राकी स्मृति दिलाती हैं। वाम और दक्षिण भागमें यक्षिणी-यक्ष चामर लिये अवस्थित हैं। चामर जटिल हैं। दोनोंकी प्रभावलि और मुखमुद्रा शान्त है परन्तु यक्षिणीकी जो मुद्रा कलाकारने अङ्कित की है उसमें स्त्री-सुलभ स्वाभाविक चाञ्चल्य विद्यमान है। उभय प्रतिमाओंके उत्तरीय वस्त्र बहुत स्पष्ट हैं। गलेमें माला, कर्णमें केयूर और भुजदण्डमें बाजूबन्ध हैं। यक्षिणीकी जो प्रतिमा है उसके वाम चरणके पास एक स्त्री स्त्रियोचित समस्त आभूषणोंसे विभूषित होकर अंजली धारे भक्तिपूर्वक नमस्कार—वन्दना—करती हुई बनाई गई है। मुखमण्डलपर सूक्ष्म दृष्टि डालनेसे अवभासित होता है कि उनके हृदयमें प्रभुके प्रति कितनी उच्च और आदर्शमय भावनाएं अन्तर्निहित हैं। ऐसी प्राकृतिक मुद्राएँ कम ही देखनेमें आती हैं। प्रश्न यह उपस्थित होता है कि यह स्त्री कौन होसकती है? मेरे मतानुसार तो यह मूर्तिनिर्माण करवानेवाली श्राविका ही होनी चाहिए; क्योंकि प्राचीन और मध्यकालीन कुछ प्रतिमाएँ मैंने ऐसी भी देखी हैं जिनमें निर्मापकयुगल रहते हैं। उभय प्रतिमाओंके उपरि भागमें पद्मासनस्थ दोनों ओर दो जिन-प्रतिमाएँ हैं। तदुपरि दोनों ओर आकाशकी आकृतिपर देवियाँ हस्तमें पुष्पमाला लिये खड़ी हैं, उनका मुखमण्डल कहता है कि वे अभी ही भगवानको मालाओंसे सुशोभित कर अपने भक्तिसिक्त हृदयका सुपरिचय देंगी। मालाओंके पुष्प भी बहुत स्पष्ट हैं। मस्तकपर छत्राकृति है। मूल प्रतिमाका निम्न भाग उतना आकर्षक और कलापूर्ण नहीं। मध्यमें धर्मचक्र और उभय तरफ विपरीतमुखवाले ग्रास हैं। परन्तु प्रतिमापर निर्माणकाल-सूचक खास संवत् या वैसा कोई उल्लेख नहीं है। अतः प्रतिमाकी निर्माणकलापरसे ही इसकी शताब्दी निर्णीत करनी होगी। मैं और चित्रवाहक सज्जन इसे अन्तिम गुप्तकालीन कृतियोंमें समाविष्ट करते हैं। पूर्वीय कलाका प्रभाव है। इस टाइपकी और भी अनेक शिल्पकृतियाँ मगधमें उपलब्ध होचुकी हैं।
लम्बाई, चौड़ाई और मुटाई इस प्रकार चित्रके पृष्ठ भागमें उल्लिखित थीं— २२ × […] × ४ इंच है।
प्रतिमा २: पहली प्रतिमाके अनुरूप
२—प्रस्तुत प्रतिमा उपर्युक्त प्रतिमाके अनुरूप है। विदित होता है कि एक ही कलाकारकी दो कृतियाँ हैं। अन्तर केवल इतना ही है कि ऊपर वाली मूर्तिमें पद्मासनस्थ २ प्रतिमाएँ हैं जब इसमें चार हैं और निम्नभागमें भी धर्मचक्रके दोनों ओर पद्मासनस्थ २ प्रतिमाएँ हैं। ग्रास नहीं हैं। परन्तु भव्यतामें कुछ उतरती हुई है। समय वही प्रतीत होता है। नाप […] इंच है।
प्रतिमा ३: पालकालीन प्रतिमा
३—एक लघुतम प्रस्तर चट्टानपर उत्कीर्णित है। इसकी रचना दोनोंसे सर्वथा भिन्न है। उभय स्कंधप्रदेशसे सटी हुई २ प्रतिमाएँ और निम्न भागमें यक्ष-यक्षिणिएँ हैं। ग्रास धर्मचक्र समान हैं। मूलका मुख बड़ा शान्त है, पर इसकी नासिका कुछ चपटी है जो बुद्ध धर्मकी आंशिक देन है क्योंकि बौद्ध कलावशेषोंमें चपटी नाक आती है जैसाकि बुद्धदेवकी जातिका ही गुण है। नेपालका प्रभाव माना जाय तो आपत्ति नहीं। नाप १३। × ६ × १॥ इंच है। नग्न है। इसे मैं पाल कालीन प्रतिमा मानता हूँ।
प्रतिमा ४: गोम्मटेश्वरकी प्रतिमाका असर
४—यह प्रतिमा कलाकौशलकी दृष्टिसे उतनी महत्वपूर्ण भले ही न हो पर मूर्तिनिर्माणशास्त्रके उल्लेखोंके सर्वथा अनुरूप है। इसकी उठी हुई छाती एक सैनिकका स्मरण दिलाती है। मुझे तो कहते तनिक भी संकोच नहीं कि इसके निर्माणपर गोम्मटेश्वर महाराजकी प्रतिमाका असर स्पष्ट है। मुख और शारीरिक रचनासे एवं हस्तोंपर बिखरी हुई लताएँ भी इसकी पुष्टि करती हैं। रचनाकाल १२ शती होगा।
प्रतिमा ५: मोटी आकृतिकी खड्गासनस्थ मूर्ति
५—यह प्रतिमा खड्गासनस्थ है। मोटी आकृति है। काल १३ शती है।
इस प्रकार पाँचों खड्गासनस्थ दिगम्बर मूर्तियां हैं।
छठवाँ चित्र: एक ताम्रपत्र
इस प्रकार पाँच चित्र प्रतिमाओंके मेरे सम्मुख आये, जैसा मुझपर प्रभाव पड़ा और समझा वह आपके सामने है। छठवाँ चित्र एक ताम्रपत्रका था, फोटू इतना रद्दी और अस्पष्ट था कि उनको ठीकसे पढ़ना असम्भव था। कार्डसाइज़में ३४ पंक्तियोंकी कृतिको कैसे पढ़ा जासकता था, परन्तु इतना अवश्य प्रतीत हुआ कि समय १२३८ आषाढ़ कृष्णा अमावस्याका है। चन्द्रदेव नृप, गोविन्दचन्द्र, मदनपाल और नृपचन्ददेवके नाम पढ़े गये। उपर्युक्त सभी सामग्री विक्रयार्थ ही किसीके संग्रहमें रखी है। नामका मुझे स्वयं पता नहीं। सुना है, ६०० रुपये मूल्य है। ताम्रपत्र अलग ६०० रुपये।[१]
पुरातत्त्वप्रेमियोंसे अनुरोध
मेरे ही सदृश और भी पुरातत्त्वप्रेमियोंको ऐसे अनुपलब्ध प्रतिमाओं तथा संस्कृतिकी सभी शाखाओंसे सम्बन्ध रखनेवाले अवशेष या चित्र दृष्टिमें आते ही होंगे। मेरा उनसे अनुरोध है कि वे इस प्रकारके नोट्स ही—यदि होसके तो चित्र भी—‘अनेकान्त’में प्रकाशनार्थ अवश्य ही भेजकर सांस्कृतिक उत्थानमें सहयोग दें। वरना सामग्री यों ही संसारसे बिदा हो जायगी। यद्यपि इस प्रकारके शाब्दिक चित्रोंसे कलाकारोंको उसके रहस्योंका सूक्ष्म परिज्ञान भले ही न हो पर पुरातत्त्वके मुझ जैसे सामान्य व्यक्तियोंको अग्रिम अध्ययनमें बड़ी सहायता मिलती है। यों तो बिहार प्रान्तके खण्डहरोंमें और पटना म्यूज़ियममें भी अनेकों सुन्दर कलापूर्ण जैन प्रतिमाएँ पाई जाती हैं जिनका विस्तृत सचित्र परिचय मैं “बिहारकी तीर्थ भूमिमें” शीर्षक निबन्धमें दूंगा।
पटना सिटी, ता० २७-४-४८
टिप्पणियाँ
जैन समाजका एक भी सार्वजनिक पुरातत्वविषयक संग्रहालय नहीं है। यह अफसोसकी बात है। वरना ऐसी सामग्रियाँ भटकती न फिरतीं। परन्तु अब ४-४ लाख रुपयेका चन्दा करके क्यों न इस ओर कदम बढ़ाया जाता, थोड़ा-थोड़ा संग्रह भी आगे विशाल संग्रहका रूप धारण कर लेता है। ‘भारतीय ज्ञानपीठ’के कार्यकर्ताओंका ध्यान मैं इन पंक्तियों द्वारा आकृष्ट करना चाहता हूँ।
स्रोत
यह लेख शोध-पत्रिका ‘अनेकान्त’ के वर्ष 9, अंक 8 (Shravana 1948) में प्रकाशित हुआ था। मूल मुद्रित पृष्ठ सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट के डिजिटल संग्रह ‘पत्रिका’ में सुरक्षित हैं — पत्रिका पर मूल लेख देखें।
प्रस्तुति: पुराने मुद्रित पाठको डिजिटल रूपमें लाते समय केवल छपाई और स्कैनकी त्रुटियाँ सुधारी गई हैं; लेखकके शब्द और उस समयकी वर्तनी यथावत् रखी गई है। उपशीर्षक पाठकोंकी सुविधाके लिए जोड़े गए हैं।



