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Research Articles

जैन दर्शन और निःशस्त्रीकरण

निःशस्त्रीकरण आज की अन्तर्राष्ट्रीय परिचर्चा का प्रमुख विषय है। साध्वी मंजुला के अनुसार यह भगवान् महावीर की शस्त्रपरिज्ञा का आधुनिक रूप है, क्योंकि वास्तविक शस्त्र हिंसा के मनोभाव हैं।

‘जैन दर्शन और निःशस्त्रीकरण’ — अनेकान्त (1966) से मंजुला का लेख
Samyakgyan Prachar-Prasar Trust
In this article
  1. निःशस्त्रीकरण शस्त्र परिज्ञा का आधुनिकीकरण है
  2. आचारांग में हिंसक और अहिंसक का विवेक
  3. हिंसा के पांच कारण
  4. हिंसा के अन्य कारण: आग्रह और अज्ञान
  5. अहिंसा की भूमिका: अभय
  6. निःशस्त्रीकरण: जैन दर्शन का सहज फलित रूप
  7. टिप्पणियाँ
  8. स्रोत

निःशस्त्रीकरण आज की अन्तर्राष्ट्रीय परिचर्चा का प्रमुख विषय है। क्योंकि आज सारा विश्व संहारक शक्ति से भयभीत और आशंकित है। लेकिन बाह्य वस्तु को शस्त्र मानना बहुत स्थूल बात है। वस्तुतः तो हिंसा के मनोभाव ही शस्त्र हैं। हिंसा के भाव उग्र हैं और शस्त्र पास में नहीं हैं तो हाथ के आभूषण या क्रीड़ा सामग्री या पूजा सामग्री भी शस्त्र का रूप ले लेगी और हिंसा के भाव क्षीण हैं तो तलवार और बाण भी निष्क्रिय पड़े रहेंगे।

निःशस्त्रीकरण शस्त्र परिज्ञा का आधुनिकीकरण है

आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व भगवान् महावीर ने शस्त्रपरिज्ञा का तत्त्व दिया जो निःशस्त्रीकरण का ही पर्याय है। आज का जन-मानस निःशस्त्रीकरण को वर्तमान युग की उपज मानता है और उसे राजनीति की पृष्ठभूमि पर फलित देखना चाहता है। लेकिन यह असंभाव्य सा लगता है। क्योंकि निःशस्त्रीकरण धर्म, दर्शन या अभय की निष्पत्ति है और राजनीति कूटनीति की परिणति। तभी तो राजनैतिक क्षेत्र में निःशस्त्रीकरण की भावनाएं फलित नहीं होती हैं। वहाँ कार्य के प्रति जितनी तीव्रता है, कारणों के प्रति उतनी ही उदासीनता है।

दर्शन की अपनी अलग प्रक्रिया है। वह कार्य की अपेक्षा कारणों के प्रति अधिक सतर्क रहता है। और यह उचित भी है। क्योंकि निःशस्त्रीकरण अहिंसा का परिणाम है, यह ठीक है लेकिन अहिंसा की भावना कैसे पनपे। अहिंसा क्या होती है? अहिंसक कौन होता है? अहिंसा क्यों की जाती है? हिंसा क्या होती है? क्यों की जाती है? हिंसक कौन होता है? हिंसा किन परिस्थितियों में की जाती है? इत्यादि परिपार्श्ववर्ती कारणों से अनपेक्ष रह कर निःशस्त्रीकरण को आकार नहीं दिया जा सकता।

आचारांग में हिंसक और अहिंसक का विवेक

भगवान् महावीर ने इन सब तथ्यों का उद्घाटन आचारांग सूत्र के प्रथम अध्ययन में बड़े मार्मिक ढंग से किया है। हिंसक और अहिंसक का विवेक देते हुए वहाँ कहा गया है कि हिंसक वह होता है जो रुग्ण होता है[1]। स्वस्थ व्यक्ति हिंसा नहीं करता। हिंसा वह करता है जो प्रमत्त—आत्मविमुख होता है। आत्मोन्मुख व्यक्ति हिंसा नहीं कर सकता[2]। हिंसा वह करता है, जो विषयार्थी होता है। विषय विमुख हिंसा किसलिए करे? हिंसा वह करता है, जो भयभीत होता है। अभय व्यक्ति हिंसा नहीं करता।

हिंसा वह करता है जो विषयास्वादी, कुटिल[3] और कृत्रिम होता है। सहज व्यक्ति हिंसा नहीं करता, हिंसा वह करता है जो आरम्भ में आसक्त है, अनासक्त व्यक्ति हिंसा नहीं करता।

हिंसा के पांच कारण

व्यक्ति हिंसा क्यों करता है? यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। इसी प्रश्न के परिप्रेक्ष्य में हम हिंसा के समग्र कारणों का तलस्पर्शी विवेचन प्राप्त कर सकते हैं।

आचारांग में हिंसा के मुख्य पांच कारण बतलाए हैं—१ आसक्ति, २ प्रयोजन, ३ प्रतिशोध, ४ सुरक्षा, ५ आशंका।

ये पांचों ही कारण सर्वथा मनोवैज्ञानिक हैं। बहुत से मम्मण जैसे व्यक्ति हैं जो बिना किसी प्रयोजन के रातदिन हिंसा में ही रत रहते हैं[4]। ऐसी हिंसा आसक्ति जनित हिंसा कहलाती है। शारीरिक, मानसिक या अन्य किसी आवश्यकतावश जो हिंसा की जाती है, वह सप्रयोजन हिंसा कहलाती है। इसमें १५ कर्मादान, कृषि, व्यापार, गृह-कार्य आदि से उद्भूत सारी हिंसाएं समाविष्ट होती हैं। जैसे कोई शरीर के लिए हिंसा करता है[5]। कोई मांस के लिए हिंसा करता है। कोई रक्त आदि के लिए हिंसा करता है। यह सब प्रयोजन हिंसा के ही प्रकार हैं।

प्रतिशोध भी हिंसा का बहुत बड़ा कारण है। बहुत से व्यक्ति ऐसे हैं जिनमें सामान्यतया हिंसा के भाव नहीं जगते लेकिन जब कोई दूसरा व्यक्ति अनिष्ट कर देता है तो वे संतुलन खो देते हैं और दबी हुई हिंसक वृत्तियां उग्र रूप ले लेती हैं फिर उनके चिन्तन का कोण ही बदल जाता है। वे सोचते हैं कि अमुक ने हमारा अनिष्ट किया है, हमारे सम्बन्धी को मारा है[6], या हमें सताया है, इसलिए हम भी उसे मारेंगे। इसके विपरीत चिन्तन का अवकाश उन्हें नहीं, कोई कुछ करे हमें अपना आत्म-धर्म समझकर सहिष्णुता की साधना करनी चाहिए। प्रतिशोधजन्य हिंसाएं सहिष्णुता के अभाव में ही होती हैं।

सुरक्षा भी हिंसा का प्रबल कारण है और यह इतना अव्यवहारिक भी नहीं है। क्योंकि साधारणतया व्यक्ति किसी पर हाथ उठाना नहीं चाहता लेकिन जब सामने वाला चल कर आक्रमण करता है तो उस समय अहिंसक रहना बहुत कठिन है। अपने बचाव के लिए सहज ही प्रत्याक्रमण के भाव उत्पन्न हो जाते हैं। अमुक मुझे मारता है, अतः मैं भी उसे मारूँगा, यह सुरक्षा प्रेरित हिंसा है[7]। बहुत से युद्धों का कारण सुरक्षा ही है।

आशंका या भय वश भी व्यक्ति भयंकर हिंसाएं कर लेता है। आशंकाजनित हिंसाएं अनगिनत हो सकती हैं। क्योंकि आशंका मन की कल्पना है और कल्पनाएं असीम हो सकती हैं। अमुक मुझे मार देगा[8], अमुक मेरा अनिष्ट कर देगा, अमुक मेरा धन हर लेगा, अमुक मेरा राज्य छीन लेगा, अमुक मेरे अहं को कुचल देगा। इत्यादि भविष्य की आशंकाएं व्यक्ति को अतर्कित हिंसा प्रयोग में नियोजित कर देती हैं।

हिंसा के अन्य कारण: आग्रह और अज्ञान

हिंसा के इन कारणों के अतिरिक्त भी कुछ कारण हैं, जिससे मानव मन की सहज वृत्तियां अभिव्यंजित होती हैं। सायकोलोजी का यह सुप्रसिद्ध सिद्धान्त है कि हर व्यक्ति महत्वाकांक्षी होता है। हर व्यक्ति बन्धन-मुक्ति का इच्छुक होता है। हर व्यक्ति दुःख प्रतिघात के लिए प्रयत्नशील रहता है। आचारांग में इन तीनों ही प्रवृत्तियों को हिंसा के हेतु रूप में स्वीकार किया है। प्रवृत्तिमात्र कोई हिंसा नहीं है। लेकिन असम्यक् कर्म हिंसा है। अथवा असत् उद्देश्य से जो कर्म किया जाता है, वह असम्यक् ही होता है। अतः उसे हिंसा में ही परिगणित किया जाएगा। कभी-कभी और कहीं-कहीं उद्देश्य सम्यक् होते हुए भी साधन की विकृति कर्म को असम्यक् बना देती है। बहुत से व्यक्ति यश, पूजा, प्रतिष्ठा और सम्मान के लिए हिंसा करते हैं। यहां उद्देश्य और साधन दोनों विकृत हैं। कई व्यक्ति जन्ममरण की परम्परा[9] से मुक्ति पाने के लिए हिंसा करते हैं। यहां साध्य पवित्र होते हुए भी साधनों की नितान्त कलुषता है। बहुत से व्यक्ति दुःख प्रतिघात के लिए हिंसा करते हैं[10]।

पूजा, प्रतिष्ठा, जन्म-मरण-मुक्ति और दुःखघात ये तीनों ही हिंसा के परिणाम नहीं हैं, फिर भी अनजान व्यक्ति हिंसा से ही इन ईप्सित चीजों को पाना चाहते हैं।

आग्रह और अज्ञान[11] भाव हिंसा के अनन्य कारण हैं। इसीलिए अज्ञान और अभिनिवेश महत्तर पाप माने गए हैं और सच तो यह है कि हिंसा के समग्र कारणों में बलवान कारण अज्ञान ही है। अज्ञान के अभाव में प्रतिशोध, आशंका, पूजा, प्रतिष्ठा आदि कारण नगण्य के बराबर हैं।

हिंसा जीवन की एक जटिल गांठ है[12]। जिसको सुलझाना बहुत कठिन है। हिंसा व्यामोह है। हिंसा-रत व्यक्ति निर्णय की शक्ति नहीं रखता। हिंसा स्वयं के लिए जीते जी मृत्यु है और भयंकर नरक है। हिंसक, हिंसा के कारण और हिंसा के स्वरूप की इतनी स्पष्टता के बाद अहिंसक, अहिंसा के कारण और अहिंसा के स्वरूप की व्याख्या आवश्यक नहीं। यह तो स्वतः फलित है—जो हिंसा के कारण नहीं हैं, वे अहिंसा के हैं। जो हिंसक वृत्तियों से या हिंसक के लिए बताए गए विशेषणों रुग्ण, प्रमादी, विषयार्थी आदि से अतीत है, वह अहिंसक है।

अहिंसा की भूमिका: अभय

अहिंसा ही जीवन है, अहिंसा ही स्वर्ग है, अहिंसा ही स्वास्थ्य है। अहिंसा में स्पष्टता है। निर्णायकता है। पर अहिंसा की भूमिका अभय है। अभय के बिना अहिंसा का उद्भव और विकास दोनों ही असंभाव्य हैं। अहिंसक की साधना का प्रथम चरण अभय है। अभय की सुदृढ़ भित्ति पर ही अहिंसा का वृक्ष फलता-फूलता है।

[…] अभय को साधना विधि का उत्कृष्ट आलम्बन जान कर उस पर अहिंसा को विकसित करता है और हिंसा से दूर होता है, वह कुशल है[13]।

आतंकद्रष्टा—अर्थात् हिंसा जीवन के लिए पीड़ाजनक है, ऐसा जो मानता जानता है, वह हिंसा में अहित देखता है और उसे न करने का संकल्प करता है[14]।

निःशस्त्रीकरण: जैन दर्शन का सहज फलित रूप

जब हिंसा के मनोभाव ही नहीं जागेंगे तो निःशस्त्रीकरण का प्रश्न स्वतः समाहित है। जिस निःशस्त्रीकरण के लिए आज विदेशों में गोष्ठियां बुलाई जाती हैं, वह जैन दर्शन का सहज फलित रूप है। जो आत्म-हित, देश-हित, समाज-हित आदि सभी दृष्टियों से अत्युत्तम है। और जिसकी समुचित प्रकृतियां भी जैन-दर्शन ने संसार को दी है।

टिप्पणियाँ

  1. आचारांग अ० १, उ० १, सूत्र ४

  2. आ० श्रु० १, अ० १, उ० १, सूत्र ३

  3. आचारांग अ० १, उ० ४, सूत्र ३ — गुणासाते वंकसमायारे पमत्ते अगारमावसे।

  4. वही, अ० १, उ० ७, सूत्र ७ — आरंभसत्ता पकरेंति संगं।

  5. वही, अ० १, उ० ६, सूत्र ५ — अप्पेगे अच्चाए वहंति।

  6. वही, अ० १, उ० ६, सूत्र ७ — अप्पेगे हिंसिंसु मेत्ति वा वहंति।

  7. आचारांग, अध्ययन १, उद्देशक ६, सूत्र ७ — अप्पेगे हिंसंति मेत्ति वा वहंति।

  8. वही, अ० १, उ० ६, सूत्र ७ — हिंसिस्संति मेत्ति वा वहंति।

  9. वही, अ० १, उ० १, सूत्र ५

  10. वही, […]

  11. आचारांग, अध्याय १, उद्देशक २, सूत्र १

  12. वही, अ० १, सूत्र ४ — एस खलु गंथे, एस खलु मोहे, एस खलु मारे, एस खलु णरए।

  13. वही, अ० १, उ० ४, सूत्र १ — अभयं विदित्ता तं जे णो करए।

  14. वही, उ० ७, सूत्र २ — आयंकदंसी अहियं ति णच्चा।

स्रोत

यह लेख शोध-पत्रिका ‘अनेकान्त’ के वर्ष 19, अंक 3 (August 1966) में प्रकाशित हुआ था। मूल मुद्रित पृष्ठ सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट के डिजिटल संग्रह ‘पत्रिका’ में सुरक्षित हैं — पत्रिका पर मूल लेख देखें।

प्रस्तुति: पुराने मुद्रित पाठको डिजिटल रूपमें लाते समय केवल छपाई और स्कैनकी त्रुटियाँ सुधारी गई हैं; लेखकके शब्द और उस समयकी वर्तनी यथावत् रखी गई है। उपशीर्षक पाठकोंकी सुविधाके लिए जोड़े गए हैं।