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Research Articles

प्रयाग

आद्य तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने पुरिमताल के सिद्धार्थ वन में वटवृक्ष के नीचे दीक्षा ली; जिनसेन और रविषेण के अनुसार इसी से यह स्थान प्रयाग कहलाया। लेख प्रयाग जैन तीर्थ के इतिहास, अक्षयवट और किले से मिली प्रतिमाओं पर प्रकाश डालता है।

‘प्रयाग’ — अनेकान्त (1971) से बलभद्र जैन का लेख
Samyakgyan Prachar-Prasar Trust
In this article
  1. पुरिमताल में दीक्षा और प्रयाग नाम
  2. केवलज्ञान और अक्षयवट
  3. त्रिवेणी संगम
  4. पुरातत्त्व
  5. राजनैतिक इतिवृत्त
  6. हिन्दू तीर्थ
  7. स्रोत

आद्य तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने जिन ५२ देशों की रचना की थी, उनमें कोशल देश भी था। उसके अन्तर्गत ही पुरिमताल नामक एक नगर था। भगवान् ने दीक्षा लेने से पूर्व अपने सौ पुत्रों को विभिन्न नगरों के राज्य दिए थे। उनमें वृषभसेन नामक पुत्र को पुरिमतालपुर का राज्य दिया। जब भगवान ने नीलांजना अप्सरा की नृत्य करते हुए मृत्यु देखी तो उनके मन में संसार, शरीर और भोगों के प्रति निर्वेद हो गया। लौकान्तिक देवों ने इस पुण्य अवसर पर आकर भगवान के वैराग्य की सराहना की, अनुमोदन किया और प्रेरणाप्रद निवेदन किया, भगवान राजपाट त्यागकर दीक्षा लेने अयोध्या से देव निर्मित पालकी ‘सुदर्शन’ में चल दिए। पालकी को सर्वप्रथम भूमिगोचरियों ने उठाया और सात कदम चले। पश्चात् विद्याधरों ने पालकी को उठाया। तदनंतर देवों ने पालकी को उठा लिया और आकाश मार्ग से चले।

आकाश में देव और इन्द्र हर्ष विभोर हो चल रहे थे और भूमि पर भगवान की स्त्रियाँ—नन्दा और सुनन्दा, अन्य परिवारी जन और जनता शोकाकुल चल रही थी। साथ भगवान के माता-पिता मरुदेवी और नाभिराय भगवान का दीक्षा कल्याणक देखने चल रहे थे।

पुरिमताल में दीक्षा और प्रयाग नाम

भगवान पुरिमतालपुर के बाहर सिद्धार्थ नामक वन में पहुँच कर पालकी से उतर पड़े और सभी प्रकार के परिग्रह का त्याग करके एक वटवृक्ष के नीचे पूर्वाभिमुख होकर अपने हाथों द्वारा केश लुंचन किया। इस प्रकार चैत्र कृष्ण नवमी के दिन सायंकाल को उत्तराषाढ़ नक्षत्र में दीक्षा ले ली। और छह मास का योग लेकर उस वट वृक्ष के नीचे एक शिला पट्ट पर आसीन हो गए। दीक्षा लेते ही भगवान को मनःपर्यय ज्ञान उत्पन्न हो गया। चार हजार राजा भगवान के साथ दीक्षित हो गए। उनमें सम्राट भरत का पुत्र मरीचि भी था। देवों ने भगवान का दीक्षा कल्याणक मनाया।

इसी समय से पुरिमताल नगर के उस स्थान का नाम प्रयाग पड़ गया। आचार्य जिनसेन ने इस सम्बन्ध में बड़े स्पष्ट शब्दों में कथन किया है।

वे लिखते हैं—

एवमुक्त्वा प्रजा यत्र प्रजापतिमपूजयन्। प्रदेशः स प्रजागाख्यो यतः पूजार्थयोगतः॥ ६-६६

अर्थात् “तुम लोगों की रक्षा के लिए मैंने चतुर भरत को नियुक्त किया है। तुम उसकी पूजा करो” भगवान के ऐसा कहने पर प्रजा ने उनकी पूजा की। प्रजा ने जिस स्थान पर भगवान की पूजा की, वह स्थान पूजा के कारण “प्रयाग” इस नाम को प्राप्त हुआ।

इसी प्रकार आचार्य रविषेण ने ‘पद्मपुराण’ में कहा है:

प्रजाग इति देशोऽसौ प्रजाभ्योऽस्मिन् गतो यतः। प्रकृष्टो वा कृतस्त्यागः प्रयागस्तेन […]॥

भगवान वृषभदेव प्रजा से दूर हो उस स्थान पर पहुँचे थे, इस लिए उस स्थान का नाम ‘प्रजाग’ प्रसिद्ध हो गया। अथवा भगवान ने उस स्थान पर बहुत भारी त्याग किया था इस लिए उसका नाम ‘प्रयाग’ भी प्रसिद्ध हुआ।

इन उल्लेखों से स्पष्ट है कि भगवान ऋषभदेव के कारण ही इस स्थान का नाम ‘प्रयाग’ पड़ा और फिर पुरिमताल नगर भी प्रयाग कहलाने लगा। क्योंकि जैन साहित्य में ऋषभदेव के पश्चात् पुरिमताल नामक किसी नगर का नाम देखने में नहीं आया। भगवान प्रजापति कहलाते थे और प्रजा उन्हें हृदय से प्रेम करती, उनपर श्रद्धा रखती थी। इसलिए भगवान के सर्वस्व त्याग जैसी अपूर्व घटना के कारण ‘प्रयाग’ नाम पड़ा और वही स्थायी हो गया।

केवलज्ञान और अक्षयवट

दीक्षा लेने के बाद भगवान यहाँ पर केवल छह मास तक ही रहे। इसके पश्चात् वे विभिन्न देशों में विहार करते रहे। ठीक एक हजार वर्ष पश्चात् वे पुनः इसी स्थान पर पधारे। भगवज्जिनसेनाचार्य के शब्दों में मौनी, ध्यानी और मान से रहित वे अतिशय बुद्धिमान भगवान धीरे-धीरे अनेक देशों में विहार करते हुए किसी दिन पुरिमताल नामक नगर के समीप जा पहुँचे। वहां शकट नामक वन में वट वृक्ष के नीचे एक शिला पर पर्यङ्कासन में विराजमान हो गए। उन्होंने ध्यानाग्नि द्वारा घातिया कर्मों का नाश कर दिया और फाल्गुण कृष्णा एकादशी को उत्तराषाढ़ नक्षत्र में भगवान को निर्मल केवलज्ञान उत्पन्न हो गया। सम्पूर्ण देवों और इन्द्रों ने वहाँ आकर केवलज्ञान की पूजा की और केवलज्ञान का महोत्सव मनाया, इन्द्र की आज्ञा से देवों ने उसी स्थान पर समवसरण की रचना की। उस समय उस नगर का नरेश वृषभसेन अनेक राजाओं के साथ भगवान के पास पहुँचा और दीक्षा लेकर भगवान का प्रथम गणधर बना। तब इस युग में प्रथम तीर्थंकर का प्रथम उपदेश यहीं पर हुआ। भगवान ऋषभदेव ने धर्मचक्र प्रवर्तन प्रयाग में ही किया।

भगवान की दीक्षा के कारण इस नगर का नाम बदल कर प्रयाग हो गया और जिस वट वृक्ष के नीचे उन्हें अक्षय ज्ञान लक्ष्मी प्राप्त हुई वह वट वृक्ष ‘अक्षयवट’ कहलाने लगा।

नन्दि संघ की गुर्वावली में अक्षय वट का उल्लेख इस प्रकार मिलता है—“श्री सम्मेदगिरि-चम्पापुरी-ऊर्जयन्तगिरि-अक्षयवट-आदीश्वरदीक्षा सर्वसिद्धक्षेत्र कृतयात्राणां।” इसमें अक्षय वट को तीर्थ स्थान माना है।

इस प्रकार दीक्षा और ज्ञान कल्याणक यहाँ मनाए गए। इसलिए यह सदा से जैन तीर्थ क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध रहा है।

त्रिवेणी संगम

यह स्थान प्राकृतिक सुषमा से समृद्ध है। गंगा-यमुना और सरस्वती का यह संगम स्थल है। इन तीन नदियों की श्वेत, नील और रक्त धाराएं मिलकर एक दूसरे में समाहित हो गई हैं। यह अक्षयवट इस त्रिवेणी संगम के तट पर खड़े हुए किले के भीतर है। इसमें तो संदेह नहीं है कि वह मूल अक्षयवट समाप्त हो गया, किन्तु उसकी वंश परम्परा के द्वारा अब तक एक अक्षयवट विद्यमान है। पहले पातालपुरी गुफा में कुछ पंडे लोग एक सूखी लकड़ी को कपड़े में लपेट कर और उसे अक्षयवट कहकर भक्त जनता को उसका दर्शन कराते थे। किन्तु अब कहते हैं, अक्षयवट का पता चल गया और अब सप्ताह में दो दिन उसके दर्शन कराये जाते हैं। यमुना किनारे के फाटक से यहाँ आ सकते हैं।

इस स्थान की यात्रा करने से भगवान ऋषभदेव की स्मृति मन में जाग उठती है और मन अनिर्वचनीय भक्तिभाव से प्लावित हो उठता है।

पुरातत्त्व

यहाँ किले में एक प्राचीन स्तम्भ है। भगवान ऋषभदेव की कल्याणक भूमि होने के कारण मौर्य सम्राट सम्प्रति ने इसका निर्माण कराया था। उस स्तम्भ को भूल से अशोक स्तम्भ कहने लगे हैं। इसके ऊपर प्रियदर्शी—जो सम्प्रति की उपाधि थी—उसकी रानी, सम्राट् समुद्रगुप्त, बीरबल और जहाँगीर के लेख भी खुदे हुए हैं।

यहाँ चाहचन्द मुहल्ला सरावगियान में एक पार्श्वनाथ पंचायती मंदिर है। इसके सम्बन्ध में यह अनुश्रुति है कि इस मन्दिर का निर्माण नौमी शताब्दी में हुआ था। इस प्रकार यह मन्दिर ११०० वर्ष प्राचीन है। यद्यपि समय समय पर मन्दिर का जीर्णोद्धार होता रहा है, अतः प्राचीनता के चिह्न पाना कठिन है। किन्तु परम्परागत अनुश्रुति इस प्रकार की है।

कुछ वर्ष पूर्व किले की खुदाई में कुछ जैन तीर्थंकरों और यक्ष यक्षिणियों की मूर्तियाँ निकली थीं। जैन समाज ने सरकारसे लेकर ये मूर्तियाँ इसी मंदिरमें विराजमान कर दी हैं। ये मूर्तियाँ केवल पुरातत्त्व की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि कलाकी दृष्टिसे भी बड़ी मूल्यवान हैं। शासन देवताओं में क्षेत्रपाल, मातृरूपिणी अम्बिका की पाषाण मूर्तियां हैं तथा छह शासन देवियों की धातु मूर्तियाँ हैं।

इनके अतिरिक्त पांच तीर्थंकर प्रतिमाएं भी प्राप्त हुई थीं। ये सभी प्रतिमाएं चतुर्थकाल की कही जाती हैं। इनमें एक प्रतिमा पार्श्वनाथ की है। इसकी अवगाहना प्रायः साढ़े चार फुट की है। इसका पाषाण […] है ऊपर फण है। फण के अगल-बगल में पुष्पमाल धारिणी देवियां हैं। और फण के ऊपर ऐरावत हाथी है। किम्वदन्ती है कि यह प्रतिमा किले में खुदाई करते समय निकली थी। हिन्दुओं ने इसे अपने भगवान की मूर्ति कहकर ले जाना चाहा। किन्तु जब जैनों को इसका पता चला तो हिन्दू लोग इसे लेने नहीं आये। किन्तु अधिकारी ने यह शर्त लगा दी कि यदि यह जैनों की प्रतिमा है तो इसे एक ही व्यक्ति उठाकर ले जाय। तब एक धार्मिक सज्जन रात भर सामायिक करते रहे और सुबह भगवान की पूजा करने के बाद मूर्ति लेने पहुँचे। और शुद्ध भाव से भगवान का स्मरण करके इसे उठाया तो यह आसानी से उठ आई। किले के बाहर से वे उसे गाड़ी में रखकर ले आये और इस मन्दिर में लाकर विराजमान कर दिया। प्रतिमा काफी विशाल और वजनदार है और साधारणतः एक आदमी इसे किसी प्रकार उठा नहीं सकता।

इसके अतिरिक्त शेष चार प्रतिमाएं भगवान ऋषभदेव की हैं, सभी बलुए लाल पत्थर की हैं। अवगाहना प्रायः चार से पांच फुट है। इन प्रतिमाओं की विशेषता इनके जटाजूट है, जो सहज ही दर्शक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। इनकी केश विन्यास शैली विविध प्रकार की है। किसी की जटायें स्कन्धों पर छितरी हुई हैं; किसी का जटाजूट शैव साधुओं जैसा है; किसी का जटा […] जैसा है, जिस प्रकार स्त्रियाँ स्नान के पश्चात् गीले बालों का […] बाँध लेती हैं। किन्तु लहराती हुई केश-राशि अथवा जटाजूट का तक्षण-कौशल इतना बारीक और वैविध्यपूर्ण है कि केशों की रेखाएं स्पष्ट परिलक्षित होती हैं।

सामान्यतः तीर्थंकर प्रतिमाओं के केशकुन्तल घुंघराले और छोटे होते हैं, उनके जटा एवं जटाजूट नहीं होते। किन्तु भगवान ऋषभदेव की कुछ प्रतिमाओं में इस प्रकार के जटा-जूट अथवा जटा देखने में आती है। इसका कारण यह है कि तीर्थंकरों के बाल नहीं बढ़ते, ऐसा नियम है किन्तु ऋषभदेव के तपस्यारत रूप का वर्णन करते हुए कुछ आचार्यों ने उन्हें जटायुक्त बताया है। आचार्य जिनसेनकृत हरिवंशपुराण में उल्लेख आया है—

सप्रलम्बजटाभारभ्राजिष्णुर्जिष्णुराबभौ। रूढप्रारोहशाखाग्रो यथा न्यग्रोधपादपः॥ ९-२०४

लम्बी लम्बी जटाओं के भार से सुशोभित आदि जिनेन्द्र उस समय ऐसे वट वृक्ष के समान सुशोभित हो रहे थे, जिसकी शाखाओं से पाये लटक रहे हों।

इसी प्रकार आचार्य रविषेण पद्मपुराण में वर्णन करते हैं—

वातोद्धूता जटास्तस्य रेजुराकुलमूर्तयः। धूमाल्य इव सद्ध्यानवह्निसक्तस्य कर्मणः॥ ३-२८८

हवा से उड़ती हुई उनकी जटाएं ऐसी जान पड़ती थीं, मानों समीचीन ध्यानरूपी अग्नि से जलते हुए कर्म के धूम की पंक्ति हो।

इस प्रकार हम देखते हैं कि ऋषभदेव की प्रतिमाओं का जटाजूट संयुक्त रूप परम्परानुकूल रहा है। इन प्रतिमाओं की रचना शैली, तक्षण कौशल, भावाभिव्यक्ति और अलंकरणादि का सूक्ष्म अध्ययन करने पर लगता है कि ये सभी प्रतिमाएं एक ही काल की हैं और उस काल की हैं, जब मूर्तिकला का पर्याप्त विकास हो चुका था।

किले के भूगर्भ से इतनी प्रतिमाओं के मिलने से अवश्य ही निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं:—

  1. अत्यन्त प्राचीन काल में इस स्थान पर जैन मन्दिर था। यह मन्दिर भगवान के दीक्षा और केवल ज्ञान कल्याणकों के रूप में स्थान पर उनकी स्मृति में बना था। जैन जनता में तीर्थ क्षेत्र के रूप में मान्य रहा और जैन लोग तीर्थ-यात्रा के लिए यहाँ आते रहे। किन्तु बाद में किस काल में इस मन्दिर का विनाश हो गया या किया गया यह कहना कठिन है।

  2. प्राचीन काल में तीर्थंकर प्रतिमाओं के साथ शासन देवताओं की मूर्ति बनाने का भी रिवाज था और उनकी मान्यता भी करते थे।

  3. मूर्तियों के पाद-मूल में लेख अंकित करने की प्रथा कुषाण काल में निश्चित रूप से प्रचलित हो गई थी। साधारण अपवादों को छोड़कर मूर्तियों पर लेख अंकित किये जाने लगे थे। कुषाण काल मूर्ति-कला के विकास की दृष्टि से स्वर्ण युग कहा जाता है। इस काल की मूर्तियां पर्याप्त विकसित अवस्था में पाई जाती हैं। अंगसौष्ठव, केशविन्यास और शरीर के उभारों में रेखाओं का सूक्ष्म अंकन कुषाण कालीन प्रतिमाओं में मिलता है।

उपर्युक्त विवरण से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जहां सम्राट् सम्प्रति ने स्तम्भ निर्मित कराया और जहाँ प्राचीन जैन मन्दिर था, वहीं प्राचीन वट वृक्ष था। वहीं भगवान के दोनों कल्याणक मनाये गये। और त्रिवेणी संगम का निकटवर्ती प्रदेश—जहाँ किला खड़ा हुआ है—जैन तीर्थ क्षेत्र था।

राजनैतिक इतिवृत्त

प्रयाग प्राचीन काल में काफी समय तक कौशल राज्य के अन्तर्गत रहा। पश्चात् यह पाटलिपुत्र साम्राज्य का एक अंग बन गया। सम्भवतः राजनैतिक इकाई के रूप में प्रयाग का स्वतन्त्र अस्तित्व कभी नहीं रहा, किन्तु शासन की सुविधा के दृष्टिकोण से इसका महत्व अवश्य रहा है। शाहंशाह अकबर ने अपने राज्य को बारह सूबों में विभाजित किया था। शासन की दृष्टि से उसने संगम पर एक मजबूत किला भी बनवाया। वह वहाँ बहुत समय तक रहा भी और उसी ने प्रयाग का नाम बदलकर इलाहाबाद कर दिया।

हिन्दू तीर्थ

हिन्दू भी प्रयाग को अपना तीर्थ मानते हैं। त्रिवेणी संगम में स्नान करने को वे बड़ा पुण्यप्रद मानते हैं। हर छह वर्ष पीछे अर्ध कुम्भ और बारह वर्ष पीछे कुम्भ होता है। उस समय लाखों यात्री यहां स्नान करने आते हैं।

स्रोत

यह लेख शोध-पत्रिका ‘अनेकान्त’ के वर्ष 24, अंक 2 (June 1971) में प्रकाशित हुआ था। मूल मुद्रित पृष्ठ सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट के डिजिटल संग्रह ‘पत्रिका’ में सुरक्षित हैं — पत्रिका पर मूल लेख देखें।

प्रस्तुति: पुराने मुद्रित पाठको डिजिटल रूपमें लाते समय केवल छपाई और स्कैनकी त्रुटियाँ सुधारी गई हैं; लेखकके शब्द और उस समयकी वर्तनी यथावत् रखी गई है। उपशीर्षक पाठकोंकी सुविधाके लिए जोड़े गए हैं।