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स्याद्वाद का व्यावहारिक जीवन में उपयोग

स्याद्वाद अपेक्षा का सिद्धान्त है। पं० चैनसुखदास न्यायतीर्थ बताते हैं कि इसे केवल शास्त्रों की चीज बना दिया गया, जबकि यह जीवन-व्यवहार का सिद्धान्त है—झगड़ों के शमन और अहिंसा के लिए उपयोगी।

‘स्याद्वाद का व्यावहारिक जीवन में उपयोग’ — अनेकान्त (1966) से चैनसुखदास न्यायतीर्थ का लेख
Samyakgyan Prachar-Prasar Trust
In this article
  1. अपेक्षावाद क्या है
  2. दुःखों का कारण स्याद्वाद की अनभिज्ञता
  3. अलबर्ट आईन्स्टीन का सापेक्षवाद
  4. पदार्थ अनंत धर्मात्मक है
  5. संसार का गुरु
  6. स्रोत

स्यात् का अर्थ है कथंचित् अर्थात् अपेक्षा और वाद का अर्थ है सिद्धान्त। तब स्याद्वाद का अर्थ हुआ अपेक्षा का सिद्धान्त। इसी के दूसरे नाम अनेकान्तवाद, सापेक्षदृष्टि एवं सापेक्षवाद हैं। इस वाद का जैनों के दार्शनिक ग्रंथों में विशद रूप से विवेचन किया गया है तथा नित्य-अनित्य, एक-अनेक, सत्-असत् और भिन्न-अभिन्न आदि परस्पर विरोधी दिखने वाले—जो वस्तुतः विरोधी नहीं हैं—स्वरूपों को समझाया है और सभी दर्शनों के समन्वय की उचित दिशा दिखलाई गई है। किन्तु दुःख की बात यही है कि इस विश्वोपयोगी सिद्धान्त को केवल शास्त्रों की चीज बना दिया गया जबकि यह जीवन व्यवहार का सिद्धान्त है। यदि हमें अपने जीवन में स्याद्वाद से प्रेरणा मिले तो न केवल हम सच्चे तत्त्वज्ञानी बन सकते हैं अपितु अपने को स्व एवं पर के लिए उपयोगी भी बना सकते हैं।

अपेक्षावाद क्या है

मैं अपने एक छात्र को अपेक्षावाद का स्वरूप समझा रहा था। मैंने उसके सामने पड़ी स्लेट पर एक रेखा खैंची और उसको पूछा कि यह रेखा छोटी है या बड़ी?

उसने उत्तर दिया कि अकेली एक रेखा को न छोटी कहा जा सकता है और न बड़ी। उसका कहना ठीक था, क्योंकि छोटापन या बड़ापन आपेक्षिक धर्म है और एक पदार्थ में अपेक्षा नहीं हो सकती। मैंने उस रेखा के पास एक छोटी रेखा और खैंच दी और पूछा कि प्रश्न का उत्तर अब दो, उसने तत्काल कहा कि पहले वाली रेखा बड़ी है, किन्तु मैंने उसके पास उससे भी एक बड़ी रेखा और खैंच दी और पूछा कि अब बोलो तो छात्र ने कहा कि इसकी अपेक्षा पहले खैंची गई रेखा छोटी है।

इतने में ही बाहर से एक युवक आया और बैठ गया, उसने अपने आने का प्रयोजन बतलाया। उसके साथ उसका एक छोटा बच्चा भी था। बातचीत के सिलसिले में मैंने उससे पूछा कि क्या तुम्हारे पिता के सबसे बड़े पुत्र तुम ही हो तो उसने उत्तर दिया कि मैं अपने पिता की एकमात्र संतान हूँ इसलिए छोटे बड़े का प्रश्न पैदा नहीं होता। छोटेपन या बड़ेपन की अभिव्यक्ति का आधार तो अपेक्षा है। युवक का कहना वस्तुतः युक्तिसंगत था। और सही बात तो यह है कि उस युवक का पुत्रत्व भी सापेक्ष था। क्योंकि वह अपने पिता की अपेक्षा तो पुत्र था। पर उसी के पास जो उसका छोटा बच्चा बैठा था उसकी अपेक्षा वह पिता भी था। वह युवक बोला इस तरह तो मैं अकेला ही मामा-भानजा, काका-भतीजा और न मालूम मैं क्या क्या हूँ। मेरा छात्र बोला तब तो मेरा शिष्यत्व और आपका गुरुत्व भी सापेक्ष हैं। मैंने कहा इसमें शक ही क्या है। सारा जगत सापेक्ष है।

बात यह है कि यह सारा विश्व सापेक्ष है। जगत का कोई व्यवहार, कोई स्थिति और कोई स्वरूप ऐसा नहीं है, जिसे सर्वथा निरपेक्ष कहा जा सके। नीचा-ऊँचा, लम्बा-ठिगना, भला-बुरा, विद्वान्-मूर्ख, दुखी-सुखी, शासक-शासित, धनी-निर्धन, सबल-निर्बल, काला-गोरा, हल्का-भारी आदि सभी सापेक्ष हैं। सज्जन-दुर्जन, अन्धकार-प्रकाश, काच-हीरा एवं मुक्त और बद्ध आदि सभी सापेक्षवाद की सीमा में आये बिना नहीं रहते। यदि मनुष्य इस सापेक्षता से परिचित न हो उसका ज्ञान ही गलत न होगा अपितु छोटी-छोटी बातों को लेकर वह झगड़ता भी रहेगा।

बात पुरानी है। योरप के किसी नगर के बीच में एक मूर्ति स्थापित की। उसका एक ओर सोने का दूसरा ओर चांदी का था। दोनों ओर से एक साथ ही दो योद्धा आये। जो घोड़े पर सवार थे। एक ने कहा अहा! यह सोने की मूर्ति कितनी सुन्दर है। किन्तु दूसरी ओर के घुड़सवार ने उसे चांदी की बताकर उसका विरोध किया किन्तु इस विरोध को वह न सह सका। और मूर्ति को सोने की बताता रहा, दोनों में बात बढ़ी और वे अपने-अपने घोड़े से उतर कर हाथापाई करने लगे। इतने में ही एक समझदार आदमी उधर से निकला और उनकी लड़ाई का कारण जानकर मूर्ति को सोने की बतलाने वाले को मूर्ति के चाँदी वाले हिस्से की ओर ले गया और चाँदी की बतलाने वाले को सोने के हिस्से की ओर खड़ा कर दिया। दोनों ही घुड़सवारों ने अपने एक पक्षीय ज्ञान का अनुभव किया। अपनी मूर्खता पर उन्हें अत्यन्त ग्लानि हुई। और वे लज्जित होकर वहाँ से चले गये।

मनुष्य की अब तक की सारी विपत्तियों का कारण उसके मन का आग्रह है। जगत के आज तक के सभी महायुद्ध और घर गृहस्थी की छोटी-बड़ी लड़ाइयें एवं सभी प्रकार के राजनीतिक-आर्थिक आदि संघर्षों का हेतु एक दूसरे की पारस्परिक अपेक्षा को नहीं समझना ही है। अपेक्षा को न समझे तो सड़क पर चलता हुआ, ट्रेन में बैठा हुआ और धर्मशाला, सराय आदि में ठहरा हुआ मनुष्य भी लड़ पड़ेगा। और खून खच्चर का कारण बन जायेगा। ऐसा मनुष्य स्वयं अपनी भी हानि करता है। और दूसरों की भी।

आधुनिक विश्व की सभी राजनीतिक-आर्थिक एवं सामाजिक कही जाने वाली समस्याएँ हल हो सकती हैं यदि उनके समाधान के लिए सापेक्ष दृष्टि का उपयोग किया जाय। किन्तु मनुष्य के मन में जो चिरकालिक पशुता (हिंसा) खेल रही है। उसके कारण वह स्याद्वाद का महत्व नहीं समझता और छोटी से छोटी बात के लिए विग्रह पैदा कर देता है।

दुःखों का कारण स्याद्वाद की अनभिज्ञता

मनुष्य के सारे दुःखों का कारण स्याद्वाद को नहीं समझना है। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि उसके अधिकांश दुःख कल्पना पर आधारित हैं और उन असत् कल्पनाओं का कारण स्याद्वाद की अनभिज्ञता है। उस दिन एक आदमी ने अपने मित्र को कहा कि दो चार दिन की देरी हो जाने से उसे ८९ रुपये क्विन्टल के भाव से गेहूँ मिले जबकि १० दिन पहले उसका मित्र ८० रुपये क्विन्टल के भाव से अच्छा गेहूँ लाया। इसका उसे बहुत दुःख था। किन्तु इतने में ही एक सज्जन आये और बोले कि मैं ९६ रुपये क्विन्टल गेहूँ लाया हूँ। इस बात को सुन कर ८९ रुपये क्विन्टल वाले भाई को कुछ संतोष हुआ। उसके संतोष का कारण उसका सापेक्ष ज्ञान था। सच कहा जाय तो यह सारा जगत पारस्परिक अपेक्षाओं से व्याप्त है। और उन्हीं से प्रेरित भी है।

अलबर्ट आईन्स्टीन का सापेक्षवाद

जब हम अलबर्ट आईन्स्टीन के सापेक्षवाद का अध्ययन करते हैं तो हम उसे जैनों के स्याद्वाद से भिन्न नहीं पाते। एक बार आईन्स्टीन से उनकी पत्नी ने “मैं सापेक्षवाद क्या है” कैसे बतलाऊँ, तो उन्होंने अपनी पत्नी को कहा कि “जब एक मनुष्य एक सुन्दर लड़की से बात कर रहा हो तो उसे एक घंटा एक मिनट जैसा लगता है और उसे ही एक गर्म चूल्हे पर बैठा दिया जाय तो एक मिनट एक घंटे बराबर लगने लगेगा।” अपेक्षावाद को समझने की यह एक मिसाल है। चाहे गणित की दृष्टि से आईन्स्टीन का सापेक्षवाद कितना ही दुरूह क्यों न हो व्यावहारिक दृष्टि से वह सरलता से समझ में आ सकता है। पदार्थों में अनन्त अपेक्षाएं विद्यमान रहती हैं और उनकी अभिव्यक्ति तब होती है जब दूसरा पदार्थ उपस्थित होता है। यह अभिव्यक्ति सामयिक होती है।

पदार्थ अनंत धर्मात्मक है

पदार्थ अनंत धर्मात्मक है। यही कारण है कि हम कभी उसे “है” कहते हैं और कभी उसे “नहीं है” कहते हैं। कभी “है और नहीं है” कहते हैं और कभी अवक्तव्य कहते हैं, इसलिए एक हिन्दी कवि कहता है कि “कोई कहे कुछ है नहीं, कोई कहे कुछ है। है और ना के बीच में, जो कुछ है सो है।”

पदार्थ के अनन्त धर्म ही उसकी अनन्त अपेक्षाओं के कारण हैं। समझ में नहीं आता कि जब पदार्थ की यह स्थिति है तब मनुष्य लड़ता क्यों है। वह अपने दृष्टिकोण को विशाल और उदार क्यों नहीं बनाता! क्यों वह छोटी-छोटी बातों को लेकर लड़ता झगड़ता है। स्याद्वाद की व्यावहारिक उपयोगिता तो यही है कि मनुष्य अपनी असहिष्णुता को दूर करे और सारे धर्मों को समन्वय की दृष्टि से देखे पर यहाँ तो उल्टी गंगा बह रही है कि स्वयं जैन ही इसका व्यावहारिक उपयोग नहीं करते हैं और आपस में लड़ते हैं। उन्हें कोर्ट में लड़ते हुए देखकर कभी-कभी न्यायाधीश भी कह देते हैं कि स्याद्वाद का उपयोग करो लड़ो मत।

संसार का गुरु

जेण विणा लोगस्स वि ववहारो सव्वहा न णिव्वडइ। तस्स भुवणेक्कगुरुणो णमो अणेगंतवायस्स॥७०॥

इस गाथा में स्याद्वाद को संसार का गुरु बतलाकर उसे प्रणाम किया गया है और बतलाया है कि इसके बिना जगत का कोई भी व्यवहार नहीं चल सकता। किन्तु सच बात तो यह है कि स्याद्वाद केवल प्रणाम करने की चीज नहीं है अपितु जीवन में उतारने का सिद्धान्त है, पर प्रश्न यह है कि क्या स्वयं जैन भी—जिन्हें यह धरोहर के रूप में प्राप्त हुआ है—इस सिद्धान्त का ठीक उपयोग करते हैं? दिगम्बर व श्वेताम्बर लड़ते हैं, दिगम्बर दिगम्बर लड़ते हैं और श्वेताम्बर श्वेताम्बर लड़ते हैं। यदि हम वास्तव में इसका संघर्षों की चिकित्सा के रूप में उपयोग नहीं कर सकते तो इसकी सारी शास्त्रीय व्याख्याएँ बेकार हैं। इसकी सप्तभंगी न्याय, सकलादेश और विकलादेश आदि विशेषताओं को जानने का प्रयोजन भी यही है कि सचाई को जहाँ से भी पकड़ सकें पकड़ लें। उसके लिए झगड़े नहीं करें। स्याद्वाद को अपने जीवन में उतारे बिना हम अहिंसा के द्वारा कभी अपने को सुसंस्कृत नहीं बना सकते। यह सिद्धान्त जैनागम का जीव अथवा बीज है। यह एक विचार पद्धति है और इस पद्धति को सभी दार्शनिकों ने किसी न किसी रूप में अवश्य अपनाया है भले ही उन्होंने इसका अपने ग्रंथों में नाम नहीं दिया हो। इसलिए यह वाद संसार का गुरु है इसमें कभी दो मत नहीं हो सकते।

स्रोत

यह लेख शोध-पत्रिका ‘अनेकान्त’ के वर्ष 19, अंक 1-2 (April–June 1966) में प्रकाशित हुआ था। मूल मुद्रित पृष्ठ सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट के डिजिटल संग्रह ‘पत्रिका’ में सुरक्षित हैं — पत्रिका पर मूल लेख देखें।

प्रस्तुति: पुराने मुद्रित पाठको डिजिटल रूपमें लाते समय केवल छपाई और स्कैनकी त्रुटियाँ सुधारी गई हैं; लेखकके शब्द और उस समयकी वर्तनी यथावत् रखी गई है। उपशीर्षक पाठकोंकी सुविधाके लिए जोड़े गए हैं।