संस्कृत से अरुचि क्यों
संस्कृत भाषा के वाङ्मय की विविधता और महत्ता के बावजूद समाज में उसके प्रति अरुचि उत्तरोत्तर बढ़ रही है। लेखक इसके अनेक कारणों का विश्लेषण कर इसे भारतीय संस्कृति के जीवन-मरण का प्रश्न बताते हैं।

In this article
- भारत के भूतपूर्व शासकों द्वारा विरोध
- पाश्चात्य सभ्यता के प्रति मोह
- अध्यापन शैली के दोष
- संस्कृत के विद्वानों और विद्यालयों की शोचनीय स्थिति
- संस्कृत व्याकरण के आधुनिक संस्करण का अभाव
- संस्कृत ग्रन्थों के आधुनिक शैली में प्रकाशन का अभाव
- समालोचना और तुलनात्मक अध्ययन की कमी
- नवीन साहित्य-सर्जना की कमी
- विश्वविद्यालयों द्वारा अपर्याप्त सहयोग
- हिन्दी के प्रति विरोध
- क्षेत्रीय भाषाओं के योगदान का अभाव
- पत्र-पत्रिकाओं के सहयोग की कमी
- विदेशों में प्रचार का अभाव
- शासकीय सहयोग की अपर्याप्तता
- शिक्षा का अर्थप्रधान उद्देश्य
- उपसंहार
- स्रोत
संस्कृत भाषा के वाङ्मय की-सी विविधता और विपुलता संसार की किसी भी भाषा में कदाचित् ही होगी। संस्कृत का महाग्रन्थ ऋग्वेद संसार की प्राचीनतम पुस्तकों में प्रथम है। आदिकवि बाल्मीकि और महाकवि कालिदास का स्थान विश्वप्रसिद्ध कतिपय महाकवियों में सर्वोपरि है। संस्कृत के व्याकरण की कोई जोड़ नहीं। मानव-जीवन के प्रत्येक पहलू पर संस्कृत ने प्रकाश डाला है। संस्कृत में जहाँ सहस्राब्दियों पूर्व की सभ्यता के दर्शन होते हैं सहस्राब्दियों के पश्चात् आने वाली सभ्यता की भविष्यवाणी भी है। संस्कृत वह भाषा है जिसमें दर्शन, विज्ञान और जीवन का अद्वितीय समन्वय मिलता है। संस्कृत साहित्य ही से विश्व के लिए शान्तिमय सन्देश प्रसारित होता है।
परन्तु उसी संस्कृत को आज की स्थिति में देखकर हमें उस सरस्वती का स्मरण आता है जिसे ब्रह्मलोक त्याग कर मर्त्यलोक आना पड़ा था। सरस्वती तो फिर भी अमृत कहलाती रही परन्तु संस्कृत को 'मृत' तक कह डाला गया। आज यह स्थिति है कि संस्कृत परम्परागत पुजारी कहलाने वाले हमीं लोग उससे अरुचि करने लगे हैं, उसके अध्ययन-मनन को अपनी गौरव-हानि समझने लगे हैं। यही नहीं, संस्कृत से हमारी अरुचि उत्तरोत्तर बढ़ रही है जिसके उदाहरण हैं वे शतशः विद्यालय और पाठशालाएँ जो छात्राभाव के कारण अन्तिम साँस ले रही हैं, वे दिग्गज संस्कृत विद्वान जो इसलिए हमारे सम्मान के पात्र नहीं रहे कि वे केवल संस्कृतज्ञ हैं और वे हम और हमारे विविध नेता जिन्हें, संस्कृत विद्या का प्रचार-प्रसार तो दूर रहे, उसे यथास्थिति कायम रखना भी दुष्कर है। कारण?
हाँ, ब्रह्मलोक त्यागकर मर्त्यलोक में सरस्वती को तो दुर्वासा के शाप से आना पड़ा था, लेकिन संस्कृत को उस स्थिति में क्यों आना पड़ा? उसका तो एक ही कारण था लेकिन इसके अनेक कारण हैं। आइए, उन कारणों पर हम कुछ विचार करें—
भारत के भूतपूर्व शासकों द्वारा विरोध
प्राचीनकाल से ही भारत अनेक आकर्षणों का केन्द्र रहा है। कदाचित् इसीलिए विदेशी शासकों ने इस देश पर मनचाहा शासन किया। उनके शासन तक तो फिर भी कुशल थी पर उसे स्थाई बनाए रखने के लिए यहाँ की संस्कृति को भी उन्होंने क्षत-विक्षत करने की चेष्टाएँ कीं। सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति प्रायः संस्कृत विद्या में ही केन्द्रित थी। अतः उन्होंने उसी पर अनेक घातक प्रहार किए, संस्कृत के विद्वानों और काव्यकारों को आश्रयहीन किया, मठ और गुरुकुल ध्वस्त किए, ग्रन्थों को अग्निसात् या जलमग्न किया और अन्ततोगत्वा उसे 'मृत भाषा' बनाकर ही छोड़ा।
संस्कृत की वर्तमान स्थिति के लिए ये विदेशी शासक बहुत कुछ उत्तरदायी हैं। कुछ विद्या-प्रेमी उदार-हृदय शासकों की चर्चा हम नहीं कर रहे हैं।
पाश्चात्य सभ्यता के प्रति मोह
अंग्रेजी शासनकाल में भारतीयों का मोह पाश्चात्य सभ्यता के प्रति तीव्र वेग से बढ़ा। यह परम्परा आज भी बहुत अंशों में कायम है। सूट-बूट से सजे आज के अप-टू-डेट नौजवान को संस्कृत विद्या में 'पण्डिताऊपन' की झलक मिलती है, उसका अध्ययन-मनन कोरा 'पुराणपंथ' प्रतीत होता है। पाश्चात्य विद्वानों ने तो संस्कृत का श्रेष्ठ अध्ययन किया है लेकिन पाश्चात्य सभ्यता से मोहित इन तथाकथित भारतीय विद्वानों और नेताओं को संस्कृत में साहित्यिक और आध्यात्मिक तत्त्व नजर नहीं आते। उसमें उन्हें मनोविज्ञान और मानव-जीवन के विश्लेषक तत्त्वों की कमी खटकती है। ये भ्रान्त धारणाएँ पाश्चात्य सभ्यता के प्रति मोह से जन्मी हैं और संस्कृति के प्रति अरुचि को जन्म दे रही हैं।
अध्यापन शैली के दोष
विश्वविद्यालयों, कालिजों और कुछ स्कूलों में संस्कृत की शिक्षा मनोवैज्ञानिक तथा परिष्कृत शैली में दी जाने लगी है। परन्तु प्राचीन पद्धति की पाठशालाओं और चटशालों में जो अध्यापन शैली प्रचलित है वह अत्यन्त दोषपूर्ण हो गई है। इनके अध्यापक मनोविज्ञान से प्रायः अपरिचित होते हैं। इनमें और बहुत-सी कमियाँ हुआ करती हैं। कालिदास और भवभूति के नाटकों का दसों बार अध्यापन कर चुकने वाले भी अध्यापक कदाचित् उन नाटकों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करने में हिचकेंगे। इन पाठशालाओं और चटशालों में ऐसे भी कोई अध्यापक मिलेंगे जिन्होंने दसों बार मेघदूत का अध्यापन किया होगा, पर वे उसमें उल्लिखित स्थानों पर भौगोलिक टिप्पणियाँ न लिख सकेंगे। वे अध्यापक भी मिल सकते हैं जिनकी जिह्वा पर नाचती होगी वेद-चतुष्टय की ऋचायें लेकिन उनमें से अधिकांश ने इस युग के प्रथम वेद संस्कारक मैक्समूलर और वेबर के नाम भी न सुने होंगे। मैं एक ऐसे अध्यापक को जानता हूँ जिन्हें कई संस्कृत ग्रन्थ अक्षरशः मुखाग्र हैं, पर वे यह नहीं बता सकते कि उन ग्रन्थों में आये हुये उद्धरण किन ग्रन्थों से लिये गये हैं। आश्चर्य नहीं जो इन पाठशालाओं और चटशालों में ऐसे अध्यापक भी मिल जाय जिन्हें अपने वर्षों से मुखाग्र किये ग्रन्थों के ग्रन्थकारों का भी नाम ज्ञात न हो, उनके व्यक्तिगत और साहित्यिक परिचय की तो बात ही क्या!
अध्यापन करते समय ये अध्यापक वर्षों के रटे-रटाये विषय को ही टेप-रिकार्डर की भाँति छात्रों के सामने रख देते हैं, आकर्षण और मनोविज्ञान के तत्त्व तो उस विषय में पहले से ही नहीं रहते। छात्रों के अहोभाग्य जो वे उसमें से कुछ सीख निकलते हैं।
इन अध्यापकों और पंडितों द्वारा प्रत्यक्ष में भले ही संस्कृत के प्रति अरुचि उत्पन्न न की जाती हो, परन्तु परोक्ष में तो ये उसके मूल कारण ही हैं। इनमें अध्ययन करने वाला आज का विज्ञान प्रेमी छात्र निश्चय ही इनसे कुप्रभावित होकर संस्कृत के प्रति गलत धारणा बना लेगा।
संस्कृत के विद्वानों और विद्यालयों की शोचनीय स्थिति
आज संस्कृत के विद्वान और विद्यालय, दोनों की आर्थिक स्थिति अत्यन्त शोचनीय है। अधिकांश विद्यालयों का संचालन विभिन्न समाजों और व्यक्तियों द्वारा किया जाता है। उनकी आय के स्रोत भी उनके संचालकों तक ही सीमित रहते हैं। शासकीय अनुदान उन्हें प्रायः नहीं मिलता। ये विद्यालय संस्कृत विद्या के प्रचार के लोभ से चलाये तो जाते हैं पर धनाभाव के कारण उनमें न तो शिक्षा के पर्याप्त और उपयुक्त साधन होते हैं और न वहाँ के अध्यापकों को पर्याप्त वेतन ही दिया जाता है। बहुत से विद्यालय समाज से चन्दा उगाहने के लिए प्रचारक रखे रहते हैं। ये प्रचारक प्रायः अल्पशिक्षित और अप्रामाणिक होते हैं - इसके माध्यम से भी जनसाधारण की श्रद्धा और रुचि संस्कृत से हट जाती है। उधर वेतन अपर्याप्त मिलने से अध्यापक उदास रहते हैं और उसी उदासी में वे छात्रों को शिक्षा देते हैं जिससे छात्र परिपक्व नहीं होने पाते। बारह वर्ष तक तन, मन और धन से जुटकर आचार्य बने, अन्त में उसे इस आसमान छूने वाली महँगाई के युग में भी सौ या उससे भी कम रुपये मिलें, इससे बढ़कर संस्कृत की अप्रतिष्ठा और क्या हो सकती है?
संस्कृत व्याकरण के आधुनिक संस्करण का अभाव
संस्कृत का व्याकरण अपनी सुव्यवस्था और वैज्ञानिकता के लिये जगत्प्रसिद्ध है। पाणिनि और पतंजलि आदि के व्याकरणों के संस्करण भी प्रामाणिक रूप में प्रकाशित हुये हैं। पर बात कुछ और है। युग की माँग उस व्याकरण की तो है लेकिन उसके वर्तमान संस्करण के रूप में नहीं। आवश्यकता ऐसे संस्करण की है जिसमें सम्पूर्ण व्याकरण को उसका एक भी शब्द परिवर्तित किये बिना ही एक नये सिरे से, नयी शैली में लिखा गया हो। इस प्रकार का सराहनीय प्रयत्न हुआ है कोष ग्रन्थों के विषय में। संस्कृत के प्राचीन कोष ग्रन्थों से शब्दावली लेकर उसे आज की 'डिक्शनरियों' में संजोया गया है जो न केवल अधिकतर वैज्ञानिक बन पड़ा है बल्कि सुविधाजनक भी हो गया है। व्याकरण के ऐसे संस्करण का अभाव भी संस्कृत के प्रति आवश्यक रुचि नहीं उत्पन्न होने देता।
संस्कृत ग्रन्थों के आधुनिक शैली में प्रकाशन का अभाव
प्रथम तो संस्कृत के सम्पूर्ण ग्रन्थ ही प्रकाश में नहीं आए हैं और जो आ भी गये हैं, उनमें बहुत ही कम ऐसे हैं जिन्हें आधुनिक शैली में सम्पादित और प्रकाशित किया गया है। विशेषतः संस्कृत ग्रन्थों के प्रकाशन में अर्थोपार्जन का चक्कर बहुत बड़ा अभिशाप बनकर सामने आया है।
जिनके प्रकाशन देश-देशान्तरों में बिकते हों उन प्रकाशकों से भी अपने ग्रन्थों को अत्यन्त हीन दशा में प्रकाशित पाकर संस्कृत निश्चय ही अपना भाग्य कोसती होगी। सैकड़ों उदाहरणों में से हम एक हितोपदेश जैसे शिक्षाप्रद और विश्वप्रिय ग्रन्थ को लें। एक जगत्प्रसिद्ध प्रकाशक ने इस ग्रन्थ का एक छात्रोपयोगी संस्करण निकाला था जिसकी लाखों प्रतियाँ बिक चुकी होंगी और बिक रही होंगी।
इस संस्करण का कागज, जिल्द, छपाई, गेट-अप आदि तो अत्यन्त निम्न कोटि के हैं ही, प्रूफ की अगणित अशुद्धियाँ, सम्पादन की अवैज्ञानिकता, साथ में संजोई गई टीका की क्लिष्टता, हिन्दी अनुवाद का पुरानापन और शिक्षा मनोविज्ञान के अनुसार आवश्यक भूमिका, प्रश्नावली, परिशिष्ट आदि का अभाव इत्यादि भी शोचनीय है। कुछ ग्रन्थ ऐसे भी प्रकाशित किये गये और किये जा रहे हैं जो किसी भी गहन वन से कम नहीं होते। उनमें विराम-चिह्नों, अनुच्छेदों, शीर्षकों और खण्ड-उपखण्डों आदि की योजना तो होती ही नहीं, यह भी ढूँढे नहीं मिलता कि अध्याय या परिच्छेद कहाँ बदल गये हैं।
यह स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं कि ऐसे प्रकाशनों से संस्कृत के प्रसार में कितनी बाधा पहुँच पाती है।
यह भी स्पष्ट है कि उत्तम प्रकाशनों के अभाव में लाखों विद्या-प्रेमियों को संस्कृत ग्रन्थों के अध्ययन से वंचित रह जाना पड़ता होगा।
समालोचना और तुलनात्मक अध्ययन की कमी
आज का युग समालोचना का है। वाङ्मय को प्रकाश में लाने का सर्वोत्तम माध्यम है समालोचना। संस्कृत में इने-गिने ग्रन्थों की ही अभी समालोचना प्रस्तुत की जा सकी है। संस्कृत ग्रन्थों के तुलनात्मक अध्ययनकी भी बड़ी कमी है। इसी तरह विश्लेषण, व्याख्या, टीका, अनुवाद आदि बहुत मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं।
इन सब कमियों और अभावों की पूर्ति किये बिना संस्कृत के प्रति समुचित रुचि जाग्रत नहीं हो सकती।
नवीन साहित्य-सर्जना की कमी
किसी भी उन्नत भाषा का यह प्रधान लक्षण है कि उसमें साहित्य-सर्जना निरन्तर होती रहे। इस दृष्टि से वर्तमान युग में संस्कृत भाषा को उन्नत नहीं कहा जा सकता। स्व० पण्डित अम्बिकादत्त व्यास, डा० के० एस० नागराजन् और पण्डित क्षमाराव आदि ने कुछ साहित्य लिखा है और है भी वह उच्चकोटि का, परन्तु मात्रा की दृष्टि से वह सब नगण्य है।
विश्वविद्यालयों द्वारा अपर्याप्त सहयोग
अधिकांश विश्वविद्यालयों में संस्कृत के पठन-पाठन की समुचित व्यवस्था है। संस्कृत के प्रचार-प्रसार में उनका यह सहयोग सराहनीय है, पर पर्याप्त नहीं। आज संस्कृत की अनेक शिक्षा-संस्थाएँ और परीक्षालय चल रहे हैं। उनमें से कुछ अत्यन्त उच्चकोटि के हैं और कुछ स्वयं शासन द्वारा संचालित होते हैं। पर इन्हें भी ये विश्वविद्यालय मान्यता नहीं देते। और तो और, एक शासन द्वारा संचालित विश्वविद्यालय भी है जिसकी आचार्य परीक्षा को बी० ए० के बराबर मान्यता देने वाले दो-तीन ही विश्वविद्यालय हैं। फलस्वरूप बी० ए० और एम० ए० के माध्यम से पल्लवग्राही संस्कृतज्ञ तो बहुत तैयार हो रहे हैं, पर शास्त्री और आचार्य के माध्यम से तैयार होने वाले ठोस और पारगामी संस्कृतज्ञ दिनों-दिन कम होते जा रहे हैं।
हिन्दी के प्रति विरोध
कुछ अंग्रेजी प्रेमी विद्वान और नेता हिन्दी का विरोध करने पर तुले हुए हैं। हिन्दी के प्रति अपने विरोध को पुष्टतर करने के लिए वे यदा-कदा संस्कृत पर भी टूट पड़ते हैं। वैसे भी हिन्दी के प्रति विरोध से संस्कृत के प्रति विरोध स्वयमेव हो जाता है क्योंकि भाषा विज्ञान, शब्दावली, व्याकरण और सामान्य लक्षणों की दृष्टि से संस्कृत हिन्दी का प्राण है। हिन्दी के प्रति विरोध में संस्कृत का और संस्कृत के प्रति विरोध में हिन्दी का जीवन स्थिर नहीं रह सकता। हिन्दी की उन्नति के लिए संस्कृत की और संस्कृत की उन्नति के लिए हिन्दी की उन्नति अनिवार्य है।
क्षेत्रीय भाषाओं के योगदान का अभाव
क्षेत्रीय भाषाओं से संस्कृत के प्रचार और प्रसार में योगदान प्राप्त नहीं होता। संस्कृत ग्रन्थों का अनुवाद क्षेत्रीय भाषाओं में नहीं के बराबर हुआ है। इन भाषाओं में ऐसे भी ग्रन्थ नहीं लिखे गये हैं जिनमें संस्कृत ग्रन्थों की समालोचना, व्याख्या और विश्लेषण आदि हो। संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दकोष जैसे संस्कृत-बंगाली, संस्कृत-गुजराती और संस्कृत-मराठी आदि भी कदाचित् ही बने होंगे। क्षेत्रीय भाषाओं के माध्यम से संस्कृत के अध्यापन की व्यवस्था भी आवश्यक है।
पत्र-पत्रिकाओं के सहयोग की कमी
कुछ पत्र-पत्रिकाएँ संस्कृत भाषा में भी प्रकाशित होती हैं। इनसे संस्कृत के प्रति रुचि का वर्धन होना स्वाभाविक है पर वह पर्याप्त नहीं। संस्कृतेतर पत्र-पत्रिकाओं से, उनकी अपनी समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुए जो प्रोत्साहन संस्कृत को मिलना चाहिए वह नहीं मिल रहा है। हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएँ तो संस्कृत को यदा-कदा छू भी लेती हैं, पर अंग्रेजी और अन्य भाषाओं की पत्रिकाएँ यह भी नहीं करतीं। लेखकों, कवियों, समालोचकों, इतिहासज्ञों और पुरातत्त्वज्ञों आदि की कलमें तो संस्कृत का पुनीत स्पर्श ही नहीं कर पातीं, सम्पादकीय लेख भी कालिदास जयन्ती आदि जैसे महत्त्वपूर्ण अवसरों पर भी नहीं देखे गये हैं।
विदेशों में प्रचार का अभाव
शासन, विभिन्न संस्थाओं और कुछ विद्या-प्रेमी श्रीमानों द्वारा भारत में तो संस्कृत विद्या का प्रचार किसी मात्रा में हो भी रहा है; पर विदेशों में किसी भी मात्रा में नहीं। गीता, पञ्चतन्त्र और शकुन्तला आदि की भाँति और भी सैकड़ों ग्रन्थ विदेशी भाषाओं में अनूदित होने योग्य हैं। संस्कृत साहित्य का इतिहास जर्मन और अंग्रेजी भाषाओं के अतिरिक्त किसी विदेशी भाषा में नहीं लिखा गया है। समालोचना और कोष-ग्रन्थ केवल अंग्रेजी में ही सुलभ हैं। संस्कृत के विद्वानों, ग्रन्थों और पत्र-पत्रिकाओं को विदेशों में प्रचारार्थ भेजने की व्यवस्था भी अभी नगण्य है।
शासकीय सहयोग की अपर्याप्तता
केन्द्रीय और राज्य शासनों का ध्यान संस्कृतकी ओर गया है; परन्तु संस्कृत की पाठशालाओं और विद्यालयों को या तो मान्यता ही न देना या प्राथमिक शालाओं के समकक्ष ही मानना, उन्हें पर्याप्त और सविशेष अनुदान न देना, संस्कृत संस्थाओं का स्वतः अत्यल्प मात्रा में संचालन करना, संस्कृत और संस्कृतज्ञों के हितों का सर्वोपरि ध्यान न रखना आदि अनेक ऐसी कमियाँ हैं जिनके कारण शासन का सहयोग पर्याप्त नहीं कहा जा सकता।
शिक्षा का अर्थप्रधान उद्देश्य
संस्कृत का उद्देश्य 'स्वान्तःसुखाय' है, जबकि आज की शिक्षा का उद्देश्य प्रधानतः अर्थोपार्जन हो गया है। एक का उद्देश्य आध्यात्मिक है और दूसरी का भौतिक। यह भी एक कारण है जिससे जन-साधारणकी रुचि संस्कृत विद्या के प्रति उत्पन्न नहीं होने पाती।
उपसंहार
संस्कृत विद्या के प्रति उत्तरोत्तर बढ़ती हुई यह अरुचि गम्भीर चिन्ता का विषय है। यह केवल एक भाषा या विद्या का ही नहीं प्रत्युत भारतीय संस्कृति के जीवन-मरण का प्रश्न है। अतएव देश, समाज, संस्कृति और साहित्य के कर्णधारों का ध्यान इस ओर अविलम्ब आना चाहिए।
स्रोत
यह लेख शोध-पत्रिका ‘अनेकान्त’ के वर्ष 21, अंक 2 (June 1968) में प्रकाशित हुआ था। मूल मुद्रित पृष्ठ सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट के डिजिटल संग्रह ‘पत्रिका’ में सुरक्षित हैं — पत्रिका पर मूल लेख देखें।
प्रस्तुति: पुराने मुद्रित पाठको डिजिटल रूपमें लाते समय केवल छपाई और स्कैनकी त्रुटियाँ सुधारी गई हैं; लेखकके शब्द और उस समयकी वर्तनी यथावत् रखी गई है। उपशीर्षक पाठकोंकी सुविधाके लिए जोड़े गए हैं।



