सूरदास और हिन्दी का जैन पद-काव्य: एक तुलनात्मक विश्लेषण
सूरसागर और बनारसीदास, द्यानतराय, भूधरदास आदि जैन कवियों के हिन्दी पद-काव्य की तुलना — वात्सल्य, विवाह, विरह, सखाभाव और चित्रमयता के आधार पर दोनों की समानताएँ और भिन्नताएँ।

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सूरदास हिन्दी-भक्ति-युग के सशक्त कवि हैं। उन्होंने भाव-विभोर होकर सगुण ब्रह्म के गीत गाये। सूरसागर इसका प्रतीक है। उसमें सूर के निर्मित सहस्रों पदों का संकलन है। ये पद गेय हैं—राग-रागनियों से समन्वित। उनका बाह्य सुन्दर है तो अन्तः सहज और पावन। सब कुछ भक्तिमय है। दूसरी ओर, इसी युगमें, जैन कवियों ने अधिकाधिक हिन्दी पद-काव्य का निर्माण किया। वह भी भक्त्यात्मक है। उसमें भी प्रसाद और लालित्य है। विविध राग-रागनियों का नर्तन वहां भी है। दोनों में बहुत कुछ साम्य है। कहीं-कहीं तो हू-बहू है। बनारसीदास, द्यानतराय, भूधरदास, भगवतीदास, जगतराम और देवब्रह्म आदि हिन्दी के समर्थ जैन कवि थे। कला और भाव दोनों दृष्टियों से सूर के समतुल्य, किसी भी दशा में कम नहीं। उनकी तुलना हिन्दी के भक्ति-काव्य में एक नया अध्याय जोड़ सकेगी।
वात्सल्य और बालरूप का चित्रण
'भगवद्भक्ति' के क्षेत्र में सूरदास वात्सल्य-रस के एकमात्र कवि माने जाते हैं। तुलसी ने भी बालक राम पर लिखा, किन्तु वह महाकाव्य के कथानक के एक अंश की पूर्ति-भर है। सूर का सानी नहीं। किन्तु जैन काव्यों में वात्सल्य भाव के विविध दृश्य उपलब्ध होते हैं। जैन कवियों ने तीर्थंकरों के बालरूप का चित्राङ्कन किया है।
इस विषय की प्रसिद्ध रचना है 'आदीश्वरफागु'। उसके रचयिता भट्टारक ज्ञानभूषण एक समर्थ कवि थे। द्यानतराय, जगतराम, बूचराज आदि ने भी आदीश्वर की बाल दशा का निरूपण किया है। कवि बनारसीदास का 'आध्यात्मिक बेटे' का चित्रण अनुपम है। इसके अतिरिक्त सूरदास का जितना ध्यान बालक कृष्ण पर जमा, बालिका राधा पर नहीं। बालिकाओं का मनोवैज्ञानिक वर्णन सीता, अञ्जना और राजुल के रूप में, जैन पद-काव्यों में उपलब्ध होता है। ब्रह्म रायमल्ल के 'हनुवन्तचरित्र' में हनुमान के बालरूप का ओजस्वी वर्णन है। वह उदात्तता परक है। […] मधुरता परक है। जैन कवियों का अधिकांश बालरूप तेजस्विता का निदर्शन है। इससे सिद्ध है कि उस पर श्रीमद्भागवत का प्रभाव नहीं था। जैन काव्यों में बाल-रस से सम्बन्धित गर्भ और जन्मोत्सवों की अपनी शैली है। वह उन्हें परम्परा से मिली है। इन उत्सवों के जैसे चित्र जैन काव्यों में उपलब्ध होते हैं, सूरसागर में नहीं। सूरदास जन्मोत्सवों के एक-दो पदों के बाद ही आगे बढ़ गये। किन्तु साथ ही यह भी सच है कि सूरदास ने अपनी बन्द आँखों से बालक कृष्ण की नाना मनोदशाओं का जैसा भाव-विभोर निरूपण किया, जैन कवि नहीं कर सके। दोनों पर अपनी-अपनी परम्पराओं का प्रभाव था। एक दूसरे से प्रभावित नहीं थे। अतः डा० रामसिंह तोमर का यह कथन कि 'हिन्दी की सभी काव्यपद्धतियों का स्पष्ट स्वरूप हमें जैन कवियों से प्राप्त हुआ है,' ठीक नहीं है।
संयोग पक्ष: किशोरावस्था और विवाह
सूरदास ने दाम्पत्यमूला भक्ति में कृष्ण की किशोरावस्था पर लिखा, और जम कर लिखा। इसमें गोचारण, रासलीला, मुरली-वादन आदि प्रसंग आ जाते हैं। इसे शृङ्गार का संयोग पक्ष कहा जा सकता है। सूरसागर में उसके एक-से-एक अनुपम दृश्य अंकित हैं। जैन काव्यों का संयोग पक्ष 'विवाह' के सन्दर्भ में सन्निहित है। वर-वधू का सौन्दर्य, उसकी साज-सज्जा और औत्सुक्य संयोग के मुख्य पहलू हैं। यहाँ जैन कवियों के चित्र सजीव हैं— देश काल की सीमा से परे। राजशेखर सूरि की राजुल और हेमविजय के नेमीश्वर— जैसे चित्र आज भी मानस के समक्ष प्रस्तुत हो जाते हैं। इनके अतिरिक्त जैन कवियों के 'आध्यात्मिक विवाह' और 'होलियों' से सम्बन्धित पद उनके अपने हैं। उन्हें यह परम्परा अपभ्रंश काव्यों से प्राप्त हुई। ये काव्य शक्ति के निदर्शन तो हैं ही, भाव प्रवणता भी स्वाभाविक है। रूपकों के माध्यम से इनमें भाव और कला दोनों का ही उत्तम रूप उपलब्ध होता है।
विरह: भ्रमरगीत और राजुल
सूर का भ्रमरगीत विरह गीत है। कृष्ण के विरह में गोपियों की वेदना। भक्ति के परिप्रेक्ष्य में यह विरह जितना पावन है उतना ही सुन्दर। यहाँ भगवद्विरह की ओट में विलासिता को यत्किञ्चित् भी प्रश्रय नहीं मिला। यद्यपि सूर की गोपियों को काम ने लुंज बना दिया है, किन्तु यह 'काम' कामवासना का नहीं अपितु विरह का पर्यायवाची है। चण्डीदास और विद्यापति की राधा की भाँति सूर की राधा न मुखरा है और न विलासोन्मुखा। शालीनता में लिची-सी, खोई-खोई सी राधा नेमीश्वर की भावी पत्नी राजुल की समवाची है। दोनों के भावों का साम्य हू-बहू है। यह कहाँ से मिला? खोज का विषय है। विवाह-मण्डप तक आकर बिना विवाह किये ही नेमीश्वर पशुओं की पुकार से द्रवित होकर दीक्षा ले गिरनार पर चले गये। विवाह-मण्डप में बैठी राजुल ने यह सुना तो उसकी असह्य वेदना हृदय की शत-शत अश्रुधाराओं में विगलित हो उठी। कृष्ण भी राधा को बिना कहे ही मथुरा चले गये फिर लौटे नहीं। दोनों में अद्भुत साम्य है। सूर के भ्रमरगीत और विनोदीलाल तथा लक्ष्मीवल्लभ के 'बारहमासों' में तुलना का पर्याप्त क्षेत्र है। किन्तु जहाँ कभी-कभी भ्रमरगीत निर्गुण के खण्डन में दत्तचित्त-सा दिखाई देता है, वहाँ जैन विरहकाव्य नितान्त काव्य की सीमा तक ही सीमित है। उसमें खण्डन-मण्डन जैसी बात नहीं है। गोपियों के पैने तर्कों ने ऊधो जैसे दार्शनिक को निरुत्तर कर दिया। काव्य रस में यह तर्क प्रवणता कहीं-कहीं रसाभास उत्पन्न करती है। जैन काव्य उससे बचे रहे। जैन कवि राजुल, सीता और अञ्जना के विरह गीतों तक ही सीमित नहीं रहे, उनका 'गुरु-विरह' एक मौलिक तत्त्व है। गुरु के विरह में शिष्य की बेचैनी राजुल से कम नहीं। दूसरी ओर जैन कवियों ने सुमति को राधा कहा और परमात्मा के विरह में उसकी बेचैनी हिन्दी काव्य को नयी देन है। इन सन्दर्भों में प्रकृति-निरूपण भी स्वाभाविक है।
सखाभाव और मीठे उपालम्भ
सूरदास की भक्ति सखाभाव की भक्ति मानी जाती है। सखा भाव के कारण ही सूर में ओजस्विता है। भैया भगवतीदास के 'ब्रह्मविलास' में भी ओज ही प्रमुख है। यह चेतन इस आत्मा को अपना सखा मानता है, जिसमें परमात्म-शक्ति मौजूद है, किन्तु जो अपने रूप को न पहचान कर इधर-उधर बहक गया है। एक सच्चे मित्र की भाँति यह जीव उसे मीठी फटकार लगाता है। जैन कवियों का पद-काव्य इस प्रवृत्ति से ओत-प्रोत है। सूर से अद्भुत साम्य है। सूर का ओज उनके मीठे उपालम्भों में खिल उठा है। जैन कवियों के उपालम्भों में भी वैसी ही दम है।
तुम प्रभु कहियत दीनदयाल।
आपन जाय मुकति में बैठे, हम जु रुलत इह जग-जाल॥
द्यानतराय का पद है। सूर के स्वर से मिलता जुलता। ऐसे अनेकानेक हैं। किन्तु जहाँ सूर के पदों में अन्य देवों के प्रति तीक्ष्णता है, वहाँ भी जैन काव्य धीर-गम्भीर बने रहे हैं। उनके उपालम्भ मर्यादा के दायरे से थोड़ा भी बिखर नहीं सके।
भक्ति के मूल स्वर: सगुण और निर्गुण
यद्यपि भक्त की प्रवृत्तियाँ और उसके दायरे सार्वभौम होते हैं, वहाँ सम्प्रदाय और धर्म सम्बन्धी वैभिन्य मिट जाता है, फिर भी कुछ-कुछ अपनी विशेषता बनी ही रहती है। सूरदास और जैन कवियों के काव्य में अद्भुत साम्य है, फिर भी उनकी प्रेरणाओं के मूल स्वर भिन्न हैं। जैसे सूर की भक्ति केवल 'सगुण ब्रह्म' की भक्ति है। उन्होंने 'निर्गुण ब्रह्म' का जबर्दस्त खण्डन किया है। जैन भक्ति में सगुण और निर्गुण जैसी दो धारायें नहीं हैं। वहाँ जो तीर्थंकर आज 'सगुण ब्रह्म' है, वह अघातिया कर्मों का नाश कर निर्गुण बन जाता है। इसी कारण जैन भक्ति और अध्यात्म में पृथकत्व नहीं है। दोनों का समन्वय ही जैन भक्ति का मूलाधार है। इसी भाँति सूरदास और जैन कवियों ने अपने-अपने आराध्यदेव से याचनायें कीं और दोनों की पूर्ण भी हुईं। किन्तु जहाँ सूर के भगवान ने स्वयं आकर पूरा किया, वहाँ जैन ब्रह्म अपनी वीतरागी विवशता से न आ सका। उसके ध्यान, स्मरण, नाम-जप आदि से जैन भक्त की जो पुण्य-प्रकृतियाँ बनती हैं, उन्हीं से वह इहलौकिक और परम्परया पारलौकिक लक्ष्य प्राप्त कर लेता है। इसी से आचार्य समन्तभद्र ने लिखा,
न पूजयार्थस्त्वयि वीतरागे न निन्दया नाथ विवान्तवैरे।
तथापि ते पुण्यगुणस्मृतिर्नः पुनाति चित्तं दुरिताञ्जनेभ्यः॥
जैन पद-काव्य: गेयता, भाषा और चित्रमयता
सूरदास और जैन कवियों के पद गेय काव्य हैं। उनमें विविध राग-रागिनियों की संगीतात्मक लय है। जैन पद काव्य के अध्ययन से सिद्ध है कि उसमें अनेक नवीन राग-रागिनियाँ हैं। गेय काव्य सदैव लोक से सम्बन्धित रहा है। वह लोक काव्य ही है। प्राकृत और अपभ्रंश काव्य लोक के सन्निकट रहा है। इसमें जैन साहित्य की अधिकाधिक रचना हुई। इसके अतिरिक्त रासक और लोक नाट्य भी जैन मंदिरों में गाये और खेले जाते थे। उनके निर्माता जैन कवि थे। वहाँ जैन हिन्दी पद काव्य की पूर्व भूमिका प्राप्त हो जाती है। क्या सूरदास के पदकाव्य को भी वहाँ से प्रेरणा मिली?—खोज का विषय है।
जहाँ तक काव्य सौन्दर्य के बाह्य पक्ष का सम्बन्ध है, सूरसागर और जैन पद-काव्य दोनों की भाषा में स्वाभाविकता, प्रसाद और लालित्य है। दोनों में अलंकारों की खींचतान नहीं है। उनकी गति सहज है। जहाँतक रूपकों का सम्बन्ध है, वह केवल सूर और जैन कवियों का नहीं, अपितु समूचे मध्यकालीन भक्ति-काव्य की प्रवृत्ति रही है। किन्तु अध्यात्म के पैराक होने के कारण जैन कवियों को यह परम्परा बहुत दूर से प्राप्त हुई और उसमें उनका सानी नहीं। उनमें कहीं पुनरावृत्ति नहीं, उबा देने वाली बात नहीं। जैन कवियों के रचित अनेक पूरे रूपक काव्य मिलते हैं। प्रकृति निरूपण में दोनों समान थे।
जैन पद-काव्य चित्रों का काव्य है। उसका एक-एक पद एक चित्र है। सूरदास में भी चित्रमयता है, किन्तु दोनों में अन्तर है। पौराणिक नामों—अजामिल, गणिका आदि की पुनरावृत्ति से जहाँ सूरदास के चित्र कहीं-कहीं धूमिल हैं, वहाँ जैन-चित्र दोषमुक्त हैं। वे अछूते तो नहीं हैं, किन्तु पुनः-पुनः की आवृत्ति से नितान्त बचे हैं। इसी कारण उनमें ऊब नहीं है। उन्होंने सौन्दर्य के प्रति क्षण नवत्व को सहेजा है। सूर थोड़ा पीछे रह गये। एक ही चित्र यदि पुनः पुनः आये तो उसकी चित्रमयता ही चुक जायेगी। सूर में ऐसा ही हुआ।
स्रोत
यह लेख शोध-पत्रिका ‘अनेकान्त’ के वर्ष 19, अंक 3 (August 1966) में प्रकाशित हुआ था। मूल मुद्रित पृष्ठ सम्यग्ज्ञान प्रचार-प्रसार ट्रस्ट के डिजिटल संग्रह ‘पत्रिका’ में सुरक्षित हैं — पत्रिका पर मूल लेख देखें।
प्रस्तुति: पुराने मुद्रित पाठको डिजिटल रूपमें लाते समय केवल छपाई और स्कैनकी त्रुटियाँ सुधारी गई हैं; लेखकके शब्द और उस समयकी वर्तनी यथावत् रखी गई है। उपशीर्षक पाठकोंकी सुविधाके लिए जोड़े गए हैं।



